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आदिवासी छात्राओं ने JEE व NEET में लहराया परचम, ‘सपनों की उड़ान’ ने लगाया उम्मीदों में पंख

झारखंड (Jharkhand) के खूंटी जिला में उपायुक्त की पहल से शुरू किये गए ‘सपनों की उड़ान’ योजना के तहत तैयारी करने के बाद दर्जन भर छात्राओं (Tribal Girl Students) ने मेडिकल की प्रवेश परीक्षा (NEET) व इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा (JEE) में पाई सफलता।


By Mohammad Sartaj Alam , 26 Jun 2023


कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, कालामाटी की जेईई व नीट में सफल छात्राएं.

झारखंड: कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, कालामाटी में सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों की छात्राओं को जिला उपायुक्त की ओर से शुरू किये गए ‘सपनों की उड़ान’ योजना के तहत जेईई मेंस (JEE Mains), जेईई एडवांस (JEE Advance) एवं नीट (NEET) परीक्षा के लिए निःशुल्क तैयारी कराई गई. इसके परिणामस्वरूप वर्ष 2023 में 54 अभ्यर्थियों में से 10 ने जेईई मेंस, दो ने नीट एवं एक छात्रा ने जेईई एडवांस में सफलता प्राप्त की.

“विकास के नाम पर झारखंड में खनिज के खनन की प्रतिस्पर्धा चलती रही है, लेकिन आदिवासियों का विकास कतई नहीं हुआ. मगर इस दौरान खूंटी में आदिवासी विद्यार्थियों को जेईई एडवांस एवं मेंस और नीट की परीक्षा के लिए तैयार किया जाता है. 12 छात्राओं की सफलता इस बात का गवाह है कि विकास की नींव झारखंड में अब रखी गई है, जिसके परिणामस्वरूप आदिवासी क्षेत्र से एमबीबीएस (MBBS) व आईआईटियन (IITians) भी निकलेंगे.”

उपरोक्त बात कहते हुए आदिवासी कार्यकर्ता दयामनी बारला भावुक हो गईं. दयामनी जिन छात्राओं की सफलता का जिक्र करती हैं, वे सभी झारखंड के सबसे पिछड़े जिलों में से एक खूंटी के ‘कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, कालामाटी’ से हैं.

जेईई मेंस उत्तीर्ण करने वाली 10 छात्राओं में से एक सुचिता सोरेन हैं, जिन्होंने मेंस के बाद एडवांस भी क्वालिफाई किया.

जेईई एडवांस क्वालिफाई करने वाली सुचिता सुरीन के माता-पिता.

बेटी की सफलता से उत्साहित सुचिता सुरीन के पिता बिरसा सुरीन कहते हैं, “मुझे बिलकुल यकीन नहीं हो रहा कि मेरी बेटी देश की सबसे मुश्किल परीक्षा में से एक जेईई एडवांस क्वालिफाई करके आईआईटी (IIT) में प्रवेश करेगी.”

खुद आठवीं तक शिक्षा प्राप्त करने वाले बिरसा आगे कहते हैं कि “मैं ‘आईआईटी’ शब्द से परिचित नहीं था, इंटर में जब सुचिता जेईई की तैयारी कर रही थी तब उसकी पुस्तक में यह लिखा हुआ पढ़ा.”

सुचिता की मां रानी सुरीन भी ‘आईआईटी’ के बारे में कुछ नहीं जानतीं, वह बड़े उत्साह से कहती हैं कि गांव वालों का कहना है अब मेरी बेटी पढ़-लिखकर इंजीनियर बन जाएगी और पैसे कमाएगी.

सुचिता के परिवार की आर्थिक स्थिति

खूंटी जिला के रनिया ब्लॉक में स्थित गांव सोदे की रहने वाली सुचिता का घर कच्ची मिट्टी से बना है, जबकि पिता बिरसा सुरीन किसान हैं. उनके पास पांच एकड़ जमीन है, लेकिन सुविधा के अभाव में उनके खेत में केवल एक फसल चावल पैदा होता है. वहीं, सुचिता की मां एक गृहणी हैं.

सुचिता के पिता कहते हैं, “मैं सिर्फ आठवीं तक पढ़ सका, इसलिए मैंने अपने सभी बच्चों को पढ़ाने का निश्चय किया. मुझे एक बेटा और छह बेटियां हैं. इस साल सुचिता ने अपनी दो बहनों के साथ इंटरमीडिएट कर लिया, जबकि बेटा छठवीं कक्षा में है. मेरे लिए बच्चों को शिक्षा दे पाना आसान नहीं था, हमारी आर्थिक स्थिति खराब थी जिसके कारण मैंने 11 साल तक उड़ीसा के एक पेट्रोल पंप पर काम किया.”

सुचिता शुरू से पढ़ने में अच्छी थीं, इसलिए उनके पिता बिरसा ने उनका दाखिला रनिया ब्लॉक स्थित कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में कराया. वहां से उन्होंने हाईस्कूल किया, जिसके बाद 12वीं (विज्ञान संकाय) में करने के लिए उन्हें स्कूल की ओर से खूंटी स्थित कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, कालामाटी भेजा गया.

“सुचिता कालामाटी जाने के बाद बहुत संतुष्ट थी, उस दौरान एक दिन उसने बोला कि बाबा आप पहले ही यहां दाखिला करा देते तो मैं और बेहतर कर सकती थी,” बिरसा सुरीन ने बताया.

सुचिता की बड़ी बहन अपीला सुरीन बताती हैं, “इस साल हम तीन बहनों ने इंटर पास किया है, जबकि सुचिता हमारे क्षेत्र से पहली लड़की है जो आईआईटी में दाखिला लेगी.”

जेईई एडवांस पास करने वाली सुचिता सुरीन.

12वीं से JEE Advance तक का सफर

सुचिता कहती हैं, “जब मैने साइंस स्ट्रीम में इंटर की पढ़ाई शुरू की, तब मुझे यह उम्मीद नहीं थी कि मैं जेईई एडवांस तक का सफर पूरा कर पाऊंगी, लेकिन जिला उपायुक्त द्वारा दी गई मोटिवेशन ने राह दिखाई. बाकी का काम सेल्फ स्टडी और स्कूल आवर के बाद डाउट क्लास ने पूरा किया.”

आईआईटी से सिविल इंजीनियरिंग (Civil Engineering) करने की इच्छुक सुचिता के अनुसार, सभी छात्राएं सुबह 4 से 8 बजे तक और शाम 6 से 8:30 बजे तक सेल्फ स्टडी करती थीं. वहीं, सुबह 9 से दोपहर 2 बजे तक स्कूल आवर होता था. स्कूल आवर के बाद सभी छात्राओं को 3 बजे से डाउट क्लास दी जाती थी.

विद्यालय में छात्राओं के अध्ययन करने की उक्त रूटीन की पुष्टि करने वाली प्रिंसिपल ज्योति कहती हैं कि वर्ष 2020 में जिला उपायुक्त ने ‘सपनों की उड़ान’ नामक एक योजना शुरू करवाई. इसके तहत 12वीं विज्ञान संकाय से करने वाली छात्राओं को बोर्ड के साथ नीट व जेईई जैसी परीक्षा के लिए तैयारी करवाई गई.

सुचिता कहती हैं, “मैंने 12वीं में झारखंड स्टेट बोर्ड से 63 फीसद अंक प्राप्त किया, जबकि जेईई एडवांस में 2348 रैंक है. आईआईटी पहुंचने का सपना ऐसे पूरा हुआ, मानो मैं अब भी सपना ही देख रही हूं.”

उपायुक्त और प्रिंसिपल ज्योती कुमारी के अलावा सुचिता अपनी सफलता का श्रेय फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथमेटिक्स के शिक्षकों को देती हैं.

सुचिता जेईई की परीक्षा देने वाली छात्राओं के लिए कहती हैं कि “पढ़ाई ड्युटी समझ कर नहीं करना चाहिए, उसे एंजॉय करना चाहिए. स्कूल आवर के अलावा रेगुलर रिवीजन पर ध्यान देने से ही सफलता मिलेगी.”

विद्यालय में 'सपनों की उड़ान' के तहत जेईई एवं नीट की तैयारी करती छात्राएं.

‘सपनों की उड़ान’ में जिसने लगाए पंख

एडिशनल डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम ऑफिसर नलिनी रंजन बताते हैं कि जिला उपायुक्त शशि रंजन का मानना था कि खूंटि जैसे क्षेत्र में छात्राओं व उनके अभिभावकों में यह विचार घर करना चाहिए कि यहां के बच्चे डॉक्टर व इंजीनियर बन सकते हैं. उनके कहने पर हमने जिले के सभी छह आवासीय विद्यालयों की हाईस्कूल पास छात्राओं की काउंसिलिंग की, जिसमें 28 छात्राओं ने 12वीं में साइंस पढ़ने की हामी भरी.

वह आगे कहते हैं, “अब मसला यह था कि ये छात्राएं अलग-अलग आवासीय विद्यालयों से थीं. ऐसे में उपायुक्त के निर्देशानुसार सभी को कालामाटी के कस्तूरबा बालिका आवासीय विद्यालय में शिफ्ट किया गया, ताकि विज्ञान संकाय के लिए एक अलग सेंटर चले.”

नलिनी रंजन के अनुसार, यहां से पहला बैच वर्ष 2022 में निकला. कोविड के प्रभाव के बावजूद उस वर्ष दो छात्राओं ने नीट व तीन छात्राओं ने जेईई मेंस क्वालिफाई किया.

वर्ष 2023 में सफल छात्राओं का जिक्र करते हुए नलिनी रंजन कहते हैं कि “इस बार 36 छात्राओं ने नीट एवं 18 छात्राओं ने जेईई के लिए तैयारी की, जिनमें से 10 जेईई में व दो नीट में सफल हुईं. जो छात्रा नीट नहीं कर सकीं, वह झारखंड कंबाइंड इंट्रेस परीक्षा के माध्यम से विभिन्‍न कोर्सेज से जुड़ेंगी.”

उनके मुताबिक, इस सफलता को देखते हुए आगामी अकादमिक वर्ष के लिए 104 भावी अभ्यर्थियों के फॉर्म आए हैं, लेकिन एक कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय में कुल 75 छात्राओं को ही दाखिला मिल सकता है. ऐसे में हमने तय किया है कि ‘सपनों की उड़ान’ योजना कालामाटी के अलावा एक अन्य कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में भी शुरू की जाएगी.

दाखिले के लिए योग्यता को लेकर नलिनी बताते हैं कि पहली शर्त यह है कि एडमिशन सिर्फ उन्हीं छात्राओं को मिलेगा जो उसी जिले की निवासी हैं जहां विद्यालय स्थित है. कस्तूरबा विद्यालय में आमतौर पर गरीब परिवार के बच्चे पढ़ते हैं. यहां छठवीं कक्षा में जो बच्चियां दाखिला लेती हैं, उनमें कुछ ऐसी होती हैं जो किन्हीं कारण से ड्रॉप आउट हो जाती हैं. वहीं, कुछ चाइल्ड ट्रैफिकिंग का शिकार होती हैं, जबकि कुछ के माता-पिता न होने पर वह अनाथ हो जाती हैं. ‘सपनों की उड़ान’ उन छात्राओं को कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय से शिक्षित करते हुए समाज की मुख्य धारा से जोड़ने की पहल है.

शोभा सुप्रिया के NEET पास करने के मायने

शोभा सुप्रिया दादेल उन दो छात्राओं में से एक हैं जिन्होंने नीट (NEET) क्वालिफाई किया है. काउंसिलिंग की प्रतीक्षा कर रहीं शोभा सुप्रिया ने भी ‘सपनों की उड़ान’ का हिस्सा रहते हुए कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय, कालामाटी से इंटरमीडिएट के साथ नीट की तैयारी की.

कच्चाबाड़ी गांव की रहने वाली शोभा सुप्रिया कहती हैं, “जब मैं 10वीं में थी तब जिला उपायुक्त ने हमारी काउंसिलिंग करवाई, वहां मेडिकल और इंजीनियरिंग विषय क्षेत्र के बारे में बताया गया. उसी दौरान मैं नीट के प्रति आकर्षित हुई और कर्रा ब्लॉक स्थित कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय से लगभग पचास किलोमीटर दूर कालामाटी के कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय में शिफ्ट हो गई.”

हाईस्कूल में 59 फीसद अंक हासिल करने वाली शोभा कहती हैं कि “हाईस्कूल तक मैं औसत छात्रा थी, लेकिन स्कूल में नीट की तैयारी के लिए जो शिक्षक आए उनकी देखरेख में मैं बेहतर करने लगी. मुझे याद है कि हम इंटर के दौरान छुट्टी में घर न जाकर स्कूल में ही रुककर तैयारी करते थे, जिसके परिणामस्वरूप मैं इंटर में 71 फीसद अंक हासिल कर सकी.”

तीन बहन और एक भाई में सबसे छोटी शोभा की सफलता से उत्साहित उनकी बड़ी बहन पूर्णिमा दादेल कहती हैं, “हमारे गांव के आसपास भी आजतक किसी ने एमबीबीएस (MBBS) की पढ़ाई नहीं की, शोभा पहली लड़की है जिसने नीट क्वालिफाई किया है.”

मां को याद करते हुए पूर्णिमा कहती हैं, “हमारी मां 10 साल पहले हम लोगों को छोड़कर दुनिया से चली गईं, जबकि पिता का देहांत पिछले वर्ष हुआ. उसके बाद से मैं और भाई खेती करते हैं, जबकि बड़ी बहन एक शोरूम में जॉब करती हैं. हम तीनों ठीक से पढ़ नहीं सके, इसलिए शोभा को पढ़ाना चाहते हैं.”

जेईई मेंस क्वालिफाई करने वाली एलिशा हस्सा.

10वीं तक डब्बा गुल, फिर जेईई मेंस किया पास

चार बहन व तीन भाइयों में पांचवें नंबर की एलिशा हस्सा कम उम्र में ही अनाथ हो गई थीं. एलिशा को मलाल है कि वह जेईई एडवांस क्वालिफाई नहीं कर सकीं, लेकिन उनकी 1778 रैंक के आधार पर उन्हें एनआईटी (NIT) मिल जाने का संतोष है.

एलिशा कहती हैं, “जेईई मेंस की सफलता के बाद मुझे अपने प्लेसमेंट की प्रतीक्षा है, जब मैं अपना घर बनवाऊंगी. क्योंकि आज भी हमारे घर में खपरैल की छत और मिट्टी से बने बरामदे हैं, कोई कमरा नहीं है.”

कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग (बीटेक) करने की इच्छुक एलिशा कहती हैं कि 10वीं तक पढ़ाई में खास रुचि नहीं थी, लेकिन इंटर में 65 फीसद अंक हासिल करने से चीजें बदल गईं.

उनके अनुसार, “हमने 10वीं तक हिंदी मीडियम से पढ़ाई की, जिसके बाद हमें इंटर की पढ़ाई अंग्रेज़ी में करनी पड़ी जो मेरे लिए सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण था.”

एलिशा की इस बात की पुष्टि करते हुए स्कूल की प्रिंसिपल ज्योती कुमारी कहती हैं कि एलिशा ही नहीं, झारखंड स्टेट बोर्ड के सभी विद्यार्थियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि हाईस्कूल हिंदी मीडियम से करने के बाद इंटरमीडिएट (विज्ञान संकाय) की पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से करना पड़ता है.

वह आगे कहती हैं, “शुरुआत में एलिशा अन्य साथियों के साथ अकसर शिकायत करती कि कुछ समझ में नहीं आ रहा, कैसे इंटर पास करेंगे. उनकी बातें हम सभी अध्यापक सुनते और उसके बाद काउंसिलिंग कर उन्हें बताते कि पढ़ते-पढ़ते खुद-ब-खुद समझ में आएगा, बस कांसेप्ट क्लियर रखो.”

ज्योति कुमारी के अनुसार, “सभी छात्राएं धीरे-धीरे फिजिक्स, केमिस्ट्री अंग्रेजी माध्यम में भी समझने लगीं. उसके पीछे विद्यालय आवासीय होने की मुख्य भूमिका है, जिसके कारण वहां छात्राओं का एक ही काम होता सिर्फ पढ़ना; ऐसे में वे सेल्फ स्टडी करने लगीं. अत: मैं दावे से कह सकती हूं कि उनकी यह सफलता कड़ी मेहनत का परिणाम है.”

प्रिंसिपल ज्योति कहती हैं कि ‘सपनों की उड़ान’ योजना शुरू करने वाले दिन ही जिला उपायुक्त शशि रंजन ने एक बात कही थी कि “हमें यह सोच बदलना है कि आदिवासी कुछ नहीं कर सकते.”

आदिवासी कार्यकर्ता दयामनी बारला कहती हैं, “कालामाटी के कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय की छात्राओं की यह सफलता ह्युमन डेवलपमेंट की तरफ सराहनीय कदम है.”

“मेरा मानना है कि हमारे नेतागण कतई नहीं चाहते कि दलित, आदिवासी बच्चे पढ़ें-लिखें और आगे बढ़ें, वरना कल्याण विभाग का पैसा इन बच्चों के विकास में पहले ही इस्तेमाल हो जाता. सरकार जिन्हें शिक्षित बता रही है, वह तो सिर्फ क,ख,ग… पढ़े हैं, क्या वे आज के ग्लोबल कंपटीशन में कंपीट कर सकते हैं? आपका जवाब ‘न’ होगा. अत: इस सफलता को रोल मॉडल बनाना चाहिए और आदिवासी छात्रों के विकास पर पैसे खर्च किए जाने चाहिए. केवल कोयला का खनन कर लेना विकास थोड़ी है,” उन्होंने अपनी बात में जोड़ा।

झारखंड के खूंटी जिला में स्थित कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय.

क्या कहते हैं शिक्षाविद रंजीत कुमार

नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रंजीत कुमार कालामाटी के कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय की छात्राओं की सफलता पर कहते हैं, “सरकारों के प्रति शुरू से ही आदिवासियों का अविश्वास रहा है. थोड़ा पीछे जाएं तो अंग्रेजों के दौर में आदिवासियों का विरोध व्यवस्था को लेकर रहा. अंग्रेज हम लोगों को लुटेरा-डाकू कहते थे, जबकि देश की आजादी के बाद से हमें नक्सली और विकास विरोधी कहा जा रहा है.”

वह आगे कहते हैं, “यह समझने वाली बात है कि आखिर व्यवस्था के प्रति आदिवासियों में अविश्वास क्यों है? इसका जवाब यह है कि सिस्टम के प्रति हमारी भी अपेक्षाएं हैं, वह जब पूरी नहीं होती तो धक्का लगता है. इसके अलावा जो हमारे आदर्श और मूल्य हैं, पूरी व्यवस्था उसके विपरीत चलती है. सिस्टम जल, जंगल व जमीन को सुरक्षा नहीं दे पाता, तो उनके प्रति अविश्वास होना स्वभाविक है.”

रंजीत कुमार के अनुसार, “सरकार के प्रयास से आदिवासी इलाकों में युवाओं के लिए ‘सपनों की उड़ान’ जैसी व्यवस्था होती है तो उसके सुखद परिणाम आएंगे और आदिवासियों का सरकार के प्रति विश्वास भी बढ़ेगा.”

क्या ऐसी व्यवस्था और पहले होनी चाहिए थी? इस सवाल के जवाब में प्रोफेसर कहते हैं कि ‘जब जागो तब सवेरा’, शुरुआत तो हुई. आज झारखंड की स्थापना को 23 साल हो चुके हैं. अगर आरंभ में ऐसी कोई व्यवस्था धरातल पर ईमानदारी से आई होती, जिससे प्रति वर्ष 10 आदिवासी भी सफल होते तो आज वैसे आदिवासियों की एक पूरी जमात होती. खैर, अब सरकार इस योजना को पूरी ईमानदारी से नियमित करे.

प्रोफेसर आगे कहते हैं कि यह व्यवस्था सिर्फ खूंटी में ही क्यों, इसे रोल मॉडल बना कर झारखंड के सभी जिलों में लागू करना चाहिए. सरकार को ऐसी योजनाओं पर खर्च करना चाहिए, ताकि आदिवासियों का समुचित विकास हो. आदिवासी के विकास के लिए ऐसी ही योजनाओं की आवश्यकता है, न कि 35 किलो चावल और एलपीजी गैस की.