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क्यों बंद हो गया यूपी का पहला Vulture रेस्टोरेंट? पर्यावरण के लिए कितने ज़रूरी हैं गिद्ध

वन्य विभाग की बेपरवाही और सरकार की अरुचि के कारण उत्तर प्रदेश का पहला Vulture Restaurant आठ साल से बंद पड़ा है। गिद्ध संरक्षण के नाम पर कहीं-कहीं उनके आशियानों को तो बचाने की पहल की गई है, मगर सिर्फ़ मरे जीव-जंतुओं के मांस पर निर्भर रहने वाले ये गिद्ध खाना ढूंढ़ने के लिए मारे-मारे फिरते हैं।


By Medhavini Mohan, 19 Apr 2023


आठ सालों से बंद पड़ा है देवगढ़ का वल्चर रेस्टोरेंट।

दुनिया भर में तरह-तरह के रेस्टोरेंट हैं, मगर कभी आपने गिद्धों के रेस्टोरेंट (Vulture Restaurant) के बारे में सुना है? आपको जानकर हैरानी हो सकती है कि कई देशों में और भारत के भी कुछ राज्यों में गिद्धों के लिए बाकायदा रेस्टोरेंट खोले गए हैं, ताकि उन्हें अपना मनपसंद खाना भरपेट मिल सके और उनकी आबादी में बढ़ोतरी हो। दुनिया का पहला वल्चर रेस्टोरेंट (World’s First Vulture Restaurant) नामीबिया में वर्ष 1987 में शुरू हुआ, जबकि भारत में यह पहली बार साल 2012 में महाराष्ट्र के रायगढ़ ज़िले में बनाया गया। वहीं, उत्तर प्रदेश का पहला वल्चर रेस्टोरेंट बुंदेलखंड के देवगढ़ में बनाया गया।

ललितपुर से 33 किमी दूर देवगढ़ बेतवा नदी के किनारे स्थित है। यह ऐतिहासिक जगह कई प्रसिद्ध हिन्दू और जैन मंदिरों और अपने समृद्ध जंगल के लिए जाना जाता है। वर्ष 2013 में यहां वल्चर रेस्टोरेंट बनने की प्रक्रिया शुरू हुई। लखनऊ विश्वविद्यालय के जीव विज्ञान विभाग और उत्तर प्रदेश के वन विभाग की कोशिशों से साल 2014 में इस रेस्टोरेंट की शुरुआत हुई। इस रेस्टोरेंट को बनाए जाने के समय देवगढ़ के रेंजर ऑफ़िसर नदीम अकबर हाशमी थे। उनकी निजी दिलचस्पी और लगातार प्रयास से यह रेस्टोरेंट चालू हुआ। एक साल तक इस रेस्टोरेंट के चलने और फिर बंद हो जाने की कहानी जानने से पहले, वल्चर रेस्टोरेंट के बारे में थोड़ा समझ लेते हैं।

द इंटरनैशनल यूनियन फ़ॉर कन्ज़र्वेशन ऑफ़ नेचर (IUCN) की रेड लिस्ट में क्रिटिकली एन्डेंजर्ड प्रजातियों में शामिल गिद्धों की आबादी बढ़ना स्वस्थ पर्यावरण के लिहाज से ज़रूरी है। उनका न होना या कम होना हम इंसानों के लिए नुक़सान-देह है। गिद्ध ऐसे पक्षी हैं जो पर्यावरण की गंदगी साफ़ करके वातावरण को हमारे रहने लायक बनाते हैं। वे हमें मरे आवारा पड़े जानवरों से होने वाले वायु प्रदूषण से बचाते हैं। लेकिन, बढ़ती आधुनिकता, कटते पेड़ों और जंगलों, माइनिंग के लिए तोड़ी जा रही चट्टानों की वज़ह से गिद्धों का घर और खाना छिन गया है। उन्हें यह सब वापस दिलाने की कोशिशों में ही एक अहम कोशिश है वल्चर रेस्टोरेंट। इसके बावज़ूद निराशा की बात यह है कि ये कोशिशें उस स्तर पर नहीं हो रहीं जिससे स्थिति को बहुत बेहतर किया जा सके।

अगर सिर्फ़ उत्तर प्रदेश की ही बात करें, तो यहां काफ़ी संख्या में गिद्ध होने के बावजूद फिलहाल एक भी वल्चर रेस्टोरेंट चालू अवस्था में नहीं है।

वर्ष 2022 के आंकड़ों के अनुसार, केवल बुंदेलखंड (उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश) में 2,880 गिद्ध हैं। लेकिन उनके संरक्षण की दिशा में सरकार की ओर से कोई ख़ास प्रयास नहीं किया जा रहा। इसमें बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश वाले इलाके की स्थिति अधिक चिंताजनक है। इस बारे में बुंदेलखंड में गिद्ध-संरक्षण पर काम कर रहे एनजीओ इंडियन बायोडायवर्सिटी कंजर्वेशन सोसायटी के सचिव डॉ. अखिलेश कुमार बताते हैं कि पिछले कुछ दशकों से गिद्धों के लिए भोजन तलाशने में कई तरह की मुश्किलें खड़ी हो रही हैं।

उनके अनुसार, “गांवों में मवेशी रखने के पैटर्न में बदलाव आया है। कृषि के आधुनिक तरीकों की तरफ़ बढ़ने से अब ग्रामीण कम मवेशी पालते हैं। इसके अलावा गाय-भैंसों को होने वाली कुछ बीमारियों के इलाज के लिए डाइक्लोफ़ेनाक जैसी दवाइयां इस्तेमाल की जाती हैं। ऐसे मवेशियों का शव खाना गिद्धों के लिए जानलेवा होता है। गिद्धों की संख्या में भारी कमी की एक बड़ी वजह यह दवा है। इसलिए, जानवरों में इसके इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है। हालांकि, अभी भी जाने-अनजाने ऐसी दवाइयां मवेशियों को दी जा रही हैं और ऐसे शवों का मांस खाने पर गिद्ध बीमार हो जाते हैं।

वह आगे कहते हैं, “गिद्धों के लिए पहले ही खाने की उपलब्धता कम है, फिर जो उपलब्ध है वो भी सुरक्षित नहीं है। इसके अलावा, जब किसी गाय-भैंस का शव यों ही कहीं भी डाल दिया जाता है तो उसे खाने कुत्ते भी पहुंचते हैं। गिद्ध जैसा शर्मीला पक्षी कुत्तों से घबराता है। आवारा और ख़ासकर जंगली कुत्ते गिद्धों पर हमला भी कर देते हैं, जिससे उनकी जान पर भी बन आती है। ऐसे में गिद्धों को पेट भर खाना नहीं मिल पाता है।”

उत्तर प्रदेश का पहला वल्चर रेस्टोरेंट सभी शर्तों पर खरा उतरता था, लेकिन फंड और रुचि के अभाव में चालू न रह सका।

अखिलेश बताते हैं कि गिद्ध कभी शिकार नहीं करते, वह केवल मरे हुए जीव ही खाते हैं। जंगल, मवेशी और सुरक्षित खाने की कमी गिद्धों के जीवन पर संकट बन गई है और उन्हें गंभीर रूप से लुप्तप्राय यानी क्रिटिकली एन्डेंजर्ड प्रजातियों में शामिल किया गया है। वे मरे जानवरों का मांस खाकर आस-पास के रिहायशी इलाकों को बदबू, वायु-प्रदूषण और बीमारियों से बचाते हैं। जबकि, अगर कुत्ते, नीलगाय, गीदड़, सूअर जैसे जानवरों के शव सड़क पर कई दिनों तक पड़े रहें, तो उनसे बीमारी फैलने का ख़तरा रहता है।

वह आगे कहते हैं, “गिद्ध पारिस्थितिकी तंत्र में एक अहम कड़ी हैं, जिनके जीवन पर संकट होने से पर्यावरण का संतुलन भी बिगड़ रहा है। वल्चर रेस्टोरेंट इन समस्याओं का कारगर हल है, बशर्ते कि इसके लिए ज़रूरी सभी बुनियादी शर्तें पूरी की जाएं।”

डॉ. अखिलेश के अनुसार, वल्चर रेस्टोरेंट रिहायशी इलाकों से दूर और एक खुले क्षेत्र में होना चाहिए, ताकि गिद्ध अपना खाना देख सकें और बेहिचक उसे खाने आ सकें। कुत्तों या दूसरे जंगली जानवरों से बचाव के मद्देनजर चारों ओर बाड़ या ईंटों की दीवार भी खड़ी की जा सकती है। उनके बैठने के लिए आस-पास ऊंचे पेड़ या आर्टिफिशियल पर्च होने चाहिए।

वह बताते हैं कि गिद्ध बहुत सफ़ाई पसंद पक्षी है। खाने के बाद वह नहाता है, ताकि उसके शरीर पर लगे मांस के कण अच्छे से हट जाएं। इसलिए, ज़रूरी है कि रेस्टोरेंट के पास तालाब, नदी, डैम जैसी कोई वॉटर बॉडी हो। इसके अलावा, रेस्टोरेंट में डाले जाने वाले शवों की पहले जांच होनी चाहिए कि उनमें किसी नॉन-स्टेरॉयडल दवा के तत्व तो मौजूद नहीं हैं जो गिद्धों के लिए ज़हर होते हैं।

देवगढ़ के महावीर स्वामी वन्यजीव अभ्यारण में बना वल्चर रेस्टोरेंट यह सभी शर्तें पूरी करता है। यह रेस्टोरेंट इंसानों की बस्ती से डेढ़-दो किमी की दूरी पर बना है और हरियाली से घिरा हुआ है। यहां डंपिंग साइट के चारों ओर ईंटों की दीवारें है और पास ही में एक तालाब भी है।

देवगढ़ के वल्चर रेस्टोरेंट के बगल में गिद्धों के नहाने की व्यवस्था है, जोकि ऐसे रेस्टोरेंट की एक ज़रूरी शर्त है।

देवगढ़ का वल्चर रेस्टोरेंट

वर्ष 2013 से 2015 तक देवगढ़ के रेंजर ऑफ़िसर रहे नदीम अकबर हाशमी बताते हैं, “रेस्टोरेंट बनाने में उतना ख़र्च नहीं आया जितना इसके लिए लोगों को जागरूक करने में आया। हम शुरू से यह बात समझते थे कि रेस्टोरेंट को चलाने में सबसे बड़ी भूमिका आस-पास के गांवों के लोग ही निभा पाएंगे। उनकी मदद के बिना कुछ भी संभव नहीं होगा। इसलिए हमने उन्हें जागरूक करने लिए गांवों, स्कूलों वगैरह में लगातार कई कार्यक्रम किए, जगह-जगह बैनर-बोर्ड लगवाए, घर-घर जाकर लोगों को गिद्धों और उनके लिए बनाए गए रेस्टोरेंट की अहमियत समझाई।”

वह आगे कहते हैं, “इसमें लखनऊ विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अमिता कनौजिया और रिसर्च स्कॉलर सोनिका कुशवाहा का भरपूर योगदान मिला। दरअसल, उन्होंने ही मेरा ध्यान इस तरफ खींचा था कि देवगढ़ में गिद्धों की संख्या को देखते हुए यहां वल्चर रेस्टोरेंट की ज़रूरत है।”

नदीम बताते हैं कि उनकी कोशिशें रंग लाने लगी और लोग अपने मृत मवेशियों को रेस्टोरेंट तक पहुंचाने लगे। ऐसा करने वालों को प्रोत्साहन राशि के तौर पर 500 रुपये दिए जाते थे। वह कहते हैं कि उस समय देवगढ़ में एक पशु-चिकित्सक थे, उनका भी इस कार्य में काफ़ी सहयोग मिला। उनके जांच करने के बाद ही शव को रेस्टोरेंट में डलवाया जाता था।

“रेस्टोरेंट में काफ़ी संख्या में गिद्ध आने लगे थे। उनके संरक्षण की दिशा में यह मज़बूत क़दम था, लेकिन फिर साल 2015 में मेरा रिटायरमेंट हो गया। उसके बाद कुछ ही समय में रेस्टोरेंट बंद पड़ गया। लोग वहां अपने मृत मवेशी लाना छोड़ दिए,” उन्होंने अपनी बात में जोड़ा।

इस बारे में देवगढ़ के एक किसान जगभान सिंह कहते हैं, “गिद्धों के रेस्टोरेंट ने हमारी कई मुसीबतें हल कर दी थीं। पालतू जानवर के मरने पर शव हटवाने में गांव के लोगों को अलग से खर्च नहीं करना पड़ता था। पहले शव को थोड़ी दूर कहीं फिंकवा दिया जाता था, लेकिन आते-जाते लोगों के लिए वह परेशानी की वज़ह बनता था। लोग अपनी बैलगाड़ी या ट्रैक्टर से ले जाकर मृत जानवर को रेस्टोरेंट में डाल आते थे। गिद्धों को खाना मिल जाता था, हमारे घरों के पास सफ़ाई बनी रहती थी और आस-पास शिकारी कुत्तों के न घूमने से हमारे पालतू पशु-पक्षी भी सुरक्षित रहते थे।”

एक दूसरे किसान रघुवीर बताते हैं, “आठ-नौ साल पहले जब रेस्टोरेंट चालू हुआ था, तब देवगढ़ के गढ़ौली और कुचदौं के अलावा पास के सहपुरा व रमपुरा गांव के लोग भी यहां अपने मृत जानवर डालने आते थे। यह व्यवस्था सभी को पसंद आई थी। वन विभाग के नदीम सर के रिटायर होने के बाद धीरे-धीरे सब पहले जैसा हो गया। लोग जहां-तहां जानवरों के शव डालने लगे। कोई भी अपना पैसा लगाकर इतनी दूर जानवर का शव डालने नहीं जाना चाहता। देवगढ़ वैसे भी ऐसी जगह है जहां के लिए कोई साधन नहीं मिलता, अपने ही साधन का प्रयोग करना होता है।”

देवगढ़ के मौजूदा रेंजर ऑफ़िसर रामसवांरे यादव से जब बंद वल्चर रेस्टोरेंट के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि ग्रामवासियों का सहयोग नहीं मिल रहा है। इसके अलावा, शव को रेस्टोरेंट में डलवाने से पहले उसकी चिकित्सकीय जांच ज़रूरी है, जबकि कभी पशु चिकित्सक उपलब्ध होते हैं और कभी नहीं। रेस्टोरेंट पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। बीच-बीच में हम किसी मवेशी की मौत होने पर शव को डलवाते रहते हैं। अभी पिछले महीने ही एक शव डलवाया गया था।

उससे पहले आख़िरी बार कब कोई मृत जानवर रेस्टोरेंट में डलवाया गया था? इस सवाल के जवाब में वह बताते हैं, “पिछले साल नवंबर में।”

देवगढ़ की चट्टानों में अलग-अलग प्रजातियों के गिद्धों के घर हैं। • Photo credit: Dr. Akhilesh Kumar

गिद्धों की संख्या

साल 2013 में देवगढ़ में गिद्धों की संख्या 60 थी, जो साल 2022 में केवल 80 तक पहुंच पाई। ललितपुर में यह संख्या 9 सालों में 300 से 460 तक ही पहुंची। पूरे बुंदेलखंड में भले ही यह संख्या क़रीब दोगुनी होकर 1,470 से 2,880 पहुंची हो, लेकिन यह भी कोई राहत वाली बात नहीं है।

इंडियन बायोडायवर्सिटी कन्ज़र्वेशन सोसायटी की डॉ. सोनिका कुशवाहा कहती हैं, “बुंदेलखंड में 100 प्रतिशत की यह बढ़ोतरी इसलिए दिख रही है, क्योंकि इसमें मध्य प्रदेश का डेटा भी शामिल है। मध्य प्रदेश में भी कोई वल्चर रेस्टोरेंट नहीं है, लेकिन उत्तर प्रदेश की तुलना में वहां गिद्धों के भोजन के प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं। यहां के मुकाबले वहां का पारिस्थितिकी तंत्र बेहतर है। यही वजह है कि मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) वल्चर स्टेट है, यानी वहां देश में सबसे ज़्यादा गिद्ध पाए जाते हैं।”

वह आगे कहती हैं कि वर्ष 2022 में हुई काउंटिंग के हिसाब से वहां 9,000 से ज़्यादा गिद्ध पाए गए। वहीं, यूपी में साल 2013 में सिर्फ़ 3,500 गिद्ध थे। यहां अभी हालिया काउंटिंग नहीं हुई है। देवगढ़, ललितपुर का जो बढ़ा हुआ डेटा है, उसमें प्रवासी गिद्ध भी शामिल हैं। माने जो गिद्ध यहां रहते नहीं हैं और बस एक ख़ास समय में यहां आते हैं। काउंटिंग में उनकी संख्या भी जुड़ जाती है।

उत्तर प्रदेश के सुहेलदेव वन्यजीव अभ्यारण में एक वल्चर रेस्टोरेंट और शुरू हुआ था, पर वह भी अधिक समय तक नहीं चल पाया।

वल्चर रेस्टोरेंट क्यों हैं ज़रूरी

सोनिका के अनुसार, “गिद्धों के संरक्षण में वल्चर रेस्टोरेंट शानदार उपाय है। सही और पूरा खाना मिलने से गिद्धों को फ़ैट, मिनरल्स और कैल्शियम (हड्डियों से) सब मिलता है। खाने की तलाश में उन्हें ज़्यादा थकना भी नहीं पड़ता। इसका सकारात्मक असर उनकी ब्रीडिंग पर देखने को मिलता है और उनकी संख्या में बढ़ोतरी के रास्ते खुलते हैं। वल्चर रेस्टोरेंट इकोटूरिज़्म की संभावना को भी बढ़ाते हैं। यूपी में अगर गिद्धों की आबादी वाली जगहों पर वल्चर रेस्टोरेंट खोले जाएं, तो गिद्धों की संख्या में पक्के तौर पर इजाफ़ा होगा।”

वह बताती हैं कि इस बीच बलरामपुर और श्रावस्ति के मिले-जुले क्षेत्र में स्थित सुहेलदेव वन्यजीव अभ्यारण में भी एक वल्चर रेस्टोरेंट की शुरुआत हुई, हालांकि उसमें ऐसे रेस्टोरेंट की बुनियादी शर्तें पूरी नहीं की गई थीं। यह रेस्टोरेंट भी चल नहीं पाया। पैसे और संसाधन की बर्बादी तो हुई ही, गिद्धों की हालत भी बेहतर नहीं हो रही।

सोनिका कहती हैं कि कुछ नैचुरल वल्चर फ़ीडिंग साइट्स को भी देख-रेख करके वल्चर रेस्टोरेंट की तरह ट्रीट किया जाता है। ध्यान रखा जाता है कि वहां गिद्धों को सुरक्षित तौर पर खाना मिलता रहे।

वर्ष 2009 में गुजरात के हज़ीरा में सूरत नेचर क्लब ने ऐसी ही वल्चर फ़ीडिंग साइट की शुरुआत की। भारत में ‘वल्चर रेस्टोरेंट’ की शुरुआत साल 2012 में महाराष्ट्र के फणसाड वन्यजीव अभ्यारण में एक एनजीओ सृष्टिज्ञान ने की। फिर महाराष्ट्र, पंजाब और राजस्थान में ऐसे और भी वल्चर रेस्टोरेंट शुरू किए गए। इनमें महाराष्ट्र के रेस्टोरेंट सबसे अच्छे से चल रहे हैं। पड़ोसी देश नेपाल में तो कई ‘जटायु रेस्टोरेंट’ सफलतापूर्वक चल रहे हैं।

रिटायर्ड रेंजर ऑफ़िसर नदीम कहते हैं, “देवगढ़ के वल्चर रेस्टोरेंट को शुरू करने और चलाने में हमने बहुत मेहनत की थी, लेकिन यह कोई एक बार का काम नहीं था। इसके लिए कोशिशें जारी रहनी चाहिए थीं। जैसे कि मैंने पहले भी कहा कि गांव वालों का हौसला बढ़ाए बिना यह काम नहीं हो सकता था। उन्हें प्रोत्साहन मिलना बंद हो गया, तो रेस्टोरेंट भी चालू नहीं रह सका।”

नदीम चाहते हैं कि किसी तरह बुंदेलखंड का वल्चर रेस्टोरेंट फिर से चल पड़े। वह कहते हैं कि “वन विभाग और कुछ लगनशील एनजीओ की मिली-जुली कोशिशों से यह रेस्टोरेंट दोबारा शुरू हो सकता है। इंडियन बायोडायवर्सिटी कन्ज़र्वेशन सोसायटी साल 2015 से बुन्देलखंड में गिद्धों के संरक्षण के लिए काम कर रहा है, लेकिन बिना सरकारी सहयोग और रुचि के रेस्टोरेंट को चला पाना संभव नहीं है।”

वह आगे कहते हैं, “आमतौर पर एनजीओ के पास पर्याप्त फंड नहीं होता। ऐसी चीज़ों के लिए चीफ़ वाइल्डलाइफ़ वार्डन से अनुमति भी लेनी होती है, जो आसान नहीं होता। अगर वर्ल्डवाइड फ़ंड फ़ॉर नेचर से लिंक करके कोई एनजीओ काम करे तो बात बन सकती है। लेकिन सबसे बड़ी बात कि अगर वन विभाग के मौजूदा अधिकारी ज़िम्मेदारी और रुचि लें, तो देवगढ़ का रेस्टोरेंट फिर से चालू हो सकता है।”