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Odisha: वन अधिकार मिलने में देरी Tribals के जीवनयापन को करती है प्रभावित

नयागढ़ के कई आदिवासी गांव वर्षों से कर रहे हैं वन अधिकारों का इंतज़ार। ग्रामीणों का कहना है कि वन अधिकार के बिना वन संरक्षण करना चुनौतीपूर्ण।

लाठी थामकर ठेंगा पाली करते रानपुर ब्लॉक ब्रह्मणकुमई गाँव के ग्रामीण। © श्री निधी

“1970 के दशक में एक समय ऐसा था जब शवदाह के लिए भी लकड़ी मिलना मुश्किल हो रहा था। आज जो ये हरा-भरा जंगल आप देख रहे हैं, ये हमने बनाया है। पहले यह मरा हुआ पहाड़ था। इसे हम गांव वालों ने मिलकर जीवित किया है,” डेंगाझरी की वरिष्ठ महिला वन संरक्षक शशि प्रधान कहती हैं। वह पचास वर्षों से डेंगाझरी में वन संरक्षण कर रही हैं। ग्रामीण शशि प्रधान को प्यार से मौसी बुलाते हैं।

नयागढ़ के रानपुर ब्लॉक का डेंगाझरी गांव एक आदिवासी गांव है। वन अधिकारों (Forest Rights Act) के प्रति सजगता और सामुदायिकता के कारण डेंगाझरी को एक मॉडल ग्राम (गांव) के रूप में देखा जाता है। यहां वन संरक्षण के उद्देश्य से “ठेंगा पाली” की शुरुआत हुई थी। दरअसल, ‘ठेंगा’ का अर्थ हुआ लाठी या छड़ी और ‘पाली’ का अर्थ हुआ घूमना या गश्त लगाना।

गांव के सदस्य मिल-जुलकर क्रमबद्ध तरीक़े से जंगल की पहरेदारी करते हैं। रानपुर में कई गांव ऐसे हैं जहां सिर्फ पुरुष ठेंगा पाली करते हैं और कुछ गांव ऐसे हैं जहां महिलाएं और पुरुष दोनों मिलकर ठेंगा पाली करते हैं। जबकि डेंगाझरी ऐसा गांव है जहां महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से कहीं अधिक है।

मा मनीनाग जंगल सुरख्या परिषद (जंगल सुरक्षा परिषद) के सदस्य नटवर प्रधान के अनुसार, “गांव के लोगों को अब तक पट्टा नहीं मिला है। पिछले दस सालों से प्रक्रिया चल रही है, लेकिन अभी जिला स्तर पर ही मामला रुका हुआ है।”

नटवर प्रधान के पास बैठीं अनीता प्रधान बताती हैं, “वर्षों से जंगल की देखरेख तो हम ही लोग करते आ रहे, फिर भी कानूनी अधिकार मिलने में इतना समय लग रहा। इस वज़ह से होता यह है कि जंगल के संसाधनों को लेकर आए दिन लोगों के बीच लड़ाई या मनमुटाव होते रहता है।”

डेंगाझरी की सामुदायिक व्यवस्था इतनी मज़बूत रही है कि कई वर्षों से वन विभाग ने भी किसी तरह की कोई दखलअंदाज़ी नहीं की।

यूं तो वन अधिकार अधिनियम को लागू करने में ओडिशा अग्रणी राज्यों में से एक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बीते 15 वर्षों में 4,63,260 वन अधिकारों (व्यक्तिगत एवं सामुदायिक) की मंजूरी दी गई है। जबकि अभी भी हज़ारों ऐसे गांव हैं जिन्हें न तो वन अधिकार और ना ही सामुदायिक एवं व्यक्तिगत वन अधिकार प्राप्त हैं। वर्ष 2020 में ओडिशा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान की एक रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के नयागढ़ जिले में कुल 1,695 गांव हैं जिनमें वन अधिकार संभावित गांवों की संख्या 1,239 है। जबकि अब तक मात्र 28 गांवों को ही सामुदायिक वन अधिकार मिल पाया है।

वन अधिकार संबंधी बैठक करते ग्रामीण। © श्री निधी

वन अधिकार में देरी, रोजी-रोटी का संकट

वन अधिकार न मिलने के कारण ग्रामीणों को तरह-तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ग्रामीण बताते हैं कि वन अधिकार नहीं मिलना या मिलने में देरी होना उनकी आदिवासियत को चुनौती देता है।

वन अधिकारों पर काम करने वाली संस्था वसुंधरा के अधिकारी नित्यानंद राय बताते हैं, “कानूनन अधिकार मिलने में देरी होने के कारण गांव वालों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पहला कि, वन विभाग से आए दिन ग्रामीणों की बहस होती रहती है। दूसरा, वन अधिकार कानून के नियम 16 के तहत जिन कल्याणकारी योजनाओं और विकास से जुड़ी गतिविधियों का ज़िक्र है, उससे ये गांव वंचित रह जाते हैं। तीसरा यह कि गांव के लोग वन संसाधनों पर चाह कर भी अपना हक नहीं जमा पाते।”

वर्ष 2012 में वन अधिकार अधिनियम में नियम 16 जोड़ा गया जिसके अनुसार, “राज्य सरकार अपने विभागों के माध्यम से विशेष रूप से जनजाति और सामाजिक कल्याण, पर्यावरण और वन, राजस्व, ग्रामीण विकास, और पंचायती राज के माध्यम से सुनिश्चित करेगी कि उपरोक्त विभागों से संबंधित सभी सरकारी योजनाएं — भूमि सुधार, भूमि उत्पादकता, बुनियादी सुविधाएँ और अन्य जीविकोपार्जन संबंधी कार्यक्रम, वन अधिकार पाने वाले सभी दावेदारों और समुदायों को मुहैया करवाई जाएगी।”

सामुदायिक भवन की दीवार पर वन अधिकार क़ानून के बारे में जानकारी सहित वन अधिकार प्राप्त व्यक्तियों के नाम। © श्री निधी

रानपुर का कोडालपल्ली गांव का जिक्र करते हुए नित्यानंद बताते हैं कि पहले वन विभाग जंगल से काजू का फ़सल इकट्ठा करने के लिए गांव के लोगों को दिहाड़ी मजदूरी पर रखता था। वर्ष 2021 में कोडालपल्ली को वन अधिकार मिलने के बाद से ग्रामीण खुद काजू की फ़सल इकट्ठा करते हैं और सीधा व्यापार करते हैं। बिचौलियों की भूमिका समाप्त तो होती ही है, वन अधिकारों के तहत गांव एवं ग्रामीण दोनों की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित होती है।

दरअसल वन अधिकार मिलने से आदिवासियों के रोज़गार पर सकारात्मक असर पड़ता है। किसी भी कंपनी अथवा सरकार के हस्तक्षेप से वन मुक्त रहते हैं। वन और वन के उत्पादों पर पहला हक गांवों का होता है। चाहे चूल्हे जलाने के लिए जलावन की लकड़ियों की ज़रूरत हो, पारंपरिक तरीके से बनाने के लिए वन उत्पादों की ज़रूरत हो, तेंदू पत्ते, जंगली खान-पान, मीट, वन्य औषधियाँ, लकड़ियाँ बाजार में बेचने संबंधी रोज़गार – ये सभी अवसर आदिवासी क्षेत्रों में वन अधिकार मिलने के बाद ही संभव हो पाते हैं।

वन अधिकार सुनिश्चित यह करते हैं कि आदिवासियों का पलायन दूसरी जगहों पर न हो। स्थानीय और विकेंद्रीत अर्थव्यवस्था के लिए वन अधिकारों का होना ज़रूरी है। साथ ही वन अधिकार गांवों की सामाजिक सुरक्षा भी सुनिश्चित करते हैं।

क्या कहते हैं जानकार

वन संरक्षण कार्यकर्ता माधव जेना रानपुर के ही एक दूसरे आदिवासी गांव गुंदूरबाड़ी में वन अधिकारों के हवाले से एक किस्से का ज़िक्र करते हैं — “गुंदूरबाड़ी के लोग भी सदियों से वन संरक्षण करते रहे हैं। पिछले वर्ष वन विभाग के अधिकारी गांव के जंगल से सागवान की लकड़ी काटकर ले जा रहे थे। गांव के कुछ लोगों की नज़र उनपर पड़ी। गांव के बच्चे, बूढ़े, महिलाएँ सबने एकजुट होकर उनके ट्रक को घेर लिया। चूंकि गांव को वन अधिकार (कम्युनिटी फॉरेस्ट राइट्स) नहीं मिला था, कानूनी रूप से वन उत्पादों पर पहला हक ग्रामीणों का नहीं हो सकता था। बहुत गहमागहमी के बाद हुआ ये कि लकड़ियों की कुछ गठरियों को छोड़ बाकी सभी लकड़ियां वन विभाग के अधिकारी लेकर चले गए।” सनद रहे कि गुंदूरबाड़ी के सामुदायिक वन अधिकार का दावा पिछले आठ वर्षों से लंबित है।

ग्रीन नोबल से समान्नित पर्यावरण एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रफुल्ल सामंत्रा वन अधिकारों में विलंब के संबंध में एक रोचक जानकारी साझा करते हैं। वह कहते हैं, “कई बार सरकार जानबूझकर गांवों को वन अधिकार देने में विलंब करती हैं और उस अवधि में वहां सर्वे करवा रही होती हैं कि कहीं यहां खनन की संभावना तो नहीं बन रही। खनन की संभावना बन आने पर सरकार विकास या राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर गांवों को वन अधिकार से वंचित कर देती है। इस तरह के कृत्य वनों पर निर्भर रहने वाले आदिवासी समुदायों के साथ अन्याय है।”