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जैव विविधता को जीएम सरसों से खतरा

सरकार के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्च में चल रही है सुनवाई। कृषि विशेषज्ञों ने की है जीएम सरसों को प्रतिबंधित करने की मांग।

बीते माह अक्टूबर में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की एक समिति जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमिटी (GEAC) ने जीएम सरसों की व्यावसायिक खेती को मंजूरी दे दी। इससे पहले भी वर्ष 2017 में सरकार ने इसकी सिफारिश की थी। लेकिन तब विभिन्न संगठनों, पर्यावरणविदों के विरोध के कारण सरकार को इस फैसले को वापस लेना पड़ा था। सरकार का मानना है कि इस प्रयोग से पैदावार बढ़ेगी और खाद्य तेल आयात में कमी आएगी। साथ ही इससे देश आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेगा। फिलहाल भारत खाद्य तेल के खपत का लगभग 50 फीसद हिस्सा बाहर के देशों से आयात करता है।

वहीं, पर्यावरण से जुड़े संगठन, किसान संगठन और यहां तक कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का स्वदेशी जागरण मंच इसका लगातार विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि जीएम सरसों का प्रयोग होने से कई किस्मों के पौधों को नुकसान पहुंच सकता है। जीएम सरसों में थर्ड ‘बार’ जिन मौजूद है, जिसके कारण उनके पौधों पर ‘ग्लूफोसनीट अमोनियम’ का असर नहीं होता। इस रसायन का छिड़काव खर-पतवार को नष्ट करने में होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसके इस्तेमाल से खर-पतवार हटाने में इंसानों की जरूरत घट जाएगी और केमिकल हर्बिसाइड्स का इस्तेमाल बढ़ेगा। स्वदेशी जागरण मंच का कहना है कि जीएम सरसों न ही स्वदेशी है और न ही सुरक्षित। उधर, किसान संगठनों ने भी जीएम सरसों के खिलाफ एकजुटता दिखाई है।

विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि जीएम सरसों के कारण मधुमक्खियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, उनकी आबादी घट सकती है। उनके मुताबिक शहद बनाने में सरसों के फूल की अहम भूमिका है। जीएम मस्टर्ड का उपयोग होने से शहद उत्पादन के व्यवसाय पर विपरीत असर पड़ेगा और मधुमक्खी पालन से जुड़े किसानों की आमदनी प्रभावित होगी। विशेषज्ञों के मुताबिक भारत में डीएमएच 11 (जीएम सरसों) से भी ज्यादा उपज देने वाली सरसों की किस्में पहले से मौजूद हैं। डीएमएच-1, डीएमएच-2, डीएमएच -3, डीएमएच-4 सरसों की पैदावार जीएम सरसों से कहीं ज्यादा है।

सरकार के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। उसमें कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत 2012 में स्थापित टेक्निकल कमिटी ने विशेष रूप से जीएम फसलों पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी। उसमें कहा गया था कि इस तरह की फसलें जैव सुरक्षा और पर्यावरण के लिए नुकसानदायक हैं, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने जीएम फसलों की खेती पर मंजूरी देने से रोक लगा दी थी।

कृषि विशेषज्ञ कपिल शाह के अनुसार, “दुनिया के 190 से ज्यादा देशों में जीएम फसलों की बुआई नहीं होती। जीएम सरसों एक हर्बिसाइड टॉलरेंट फसल है जो किसानों को असीमित मात्रा में हर्बिसाइड छिड़कने की इजाजत देता है। इससे दूसरे खेत के पौधों और मधुमक्खी पालन में किसानों को समस्या होगी। साथ ही मिट्टी और पानी भी दूषित होगा। ऐसे में हम मोनोक्रॉपिंग की ओर बढ़ेंगे जिससे खेती में विविधता को नुकसान पहुंचेगा। उन्होंने कहा कि इसका पर्यावरण व लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। आगे वह कहते हैं कि जीएम सरसों की बुआई कई जगहों पर हो चुकी है और 35-40 दिन में उसके फूल निकलने लगेंगे। उनका मानना है कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट को पर्यावरण व किसानों के हित में फैसला लेना चाहिए।”

सामाजिक कार्यकर्ता और वरिष्ठ कृषि विशेषज्ञ कविता कुरुगंती सुप्रीम कोर्ट में सरकार के दिए हलफनामों पर प्रश्न उठाती हैं। उन्होंने कहा कि सरकार कोर्ट को भ्रामक दिशा में ले जाने की कोशिश कर रही है। कविता के अनुसार, “टेक्निकल एक्सपर्ट कमिटी का साफ मानना था कि देश में हर्बिसाइड टॉलरेंट क्रॉप को इजाजत नहीं दिया जाए। सरकार टेक्निकल एक्सपर्ट कमिटी के मुख्य सिफारिशों को पूरी तरह नजरअंदाज कर रही है। सरकार का कहना है कि जीएम सरसों हर्बिसाइड्स टॉलरेंट क्रॉप नहीं है। वहीं दूसरी ओर इसमें ‘बार’ जिन की मौजूदगी कहानी को उलट बयां करती है। ये विधि उन देशों के लिए है जहां श्रमिक मजदूर कम हों।”

गौरतलब है कि सरसों के मामले में भारत विविधताओं का केंद्र रहा है। डीएमएच-11 के आने से इस पर बुरा असर पड़ेगा। विशेषज्ञ कहते हैं कि जीएम सरसों की मंजूरी हेल्थ एक्सपर्ट से सलाह लिए बगैर हुई है। उनका मानना है कि रेगुलेटरी बॉडी में इंडस्ट्री व जीएम क्रॉप डेवलपर्स ने खुद बैठकर निर्णय लिए हैं। खेती में इस बदलाव का लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।

सरसों अनुसंधान निदेशालय के डॉ. धीरज सिंह के अनुसार, “हाइब्रिड सरसों बनाने के लिए जीएम तकनीक का उपयोग करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इससे पहले भी हाइब्रिड बनते रहे हैं जिसमें निजी कंपनियों का बड़ा हाथ रहा है। उन्होंने कहा कि देश में 16 साल से सरसों के हाइब्रिड बीज मार्केट में उपलब्ध हैं। जब ये खाद्य तेल आयात को कम नहीं कर सके तो क्या गारंटी है कि इससे उत्पादन क्षमता बढ़ेगी?” सिंह ‘बीज उत्पादन व्यवस्था’ पर जोर देने की बात करते हैं न कि हाइब्रिड बनाने की पद्धति पर।

डॉ. धीरज के मुताबिक, अगर सरकार बुआई का मशीन किसानों को मुहैया करा दे तो उत्पादन में बेहतरी और बढ़ोतरी होने की काफी संभावना है। देश के 394 जिलों में सरसों की पैदावार होती है, जिसकी उत्पादन क्षमता 250 टन से 2800 टन के बीच होती है। इसका एक बड़ा कारण तकनीकि गैप है। एक ही राज्य में कहीं उत्पादन बहुत है तो कहीं काफी कम। जैसे उत्तर प्रदेश, जहां किसी जगह उत्पादन 0.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है तो वहीं दूसरी ओर उसी राज्य में ऐसे भी जगह हैं जहां उत्पादन 12.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। उन्होंने कहा कि अगर अभी भी हम तकनीकि गैप पर ध्यान दें तो इससे उत्पादन में 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है। देश के जितने क्षेत्र में सरसों का उत्पादन हो रहा है, उसमें 30 प्रतिशत क्षेत्र ऐसे हैं जहां सिर्फ सरसों की ही फसल हो सकती है। उन किसानों के बेहतरी के लिए डॉ. सिंह सरकार की ओर से उन्हें सब्सिडी देने पर जोर देते हैं।”