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महंगाई से जनता हलकान: किसी की थाली से गायब हो रही हरी सब्ज़ियाँ तो कोई रेपो रेट बढ़ने से चिंतित

बिहार से बेहतर जिंदगी की तलाश में संतोष दिल्ली आए थे। यहां सब्जी की रेहड़ी लगाई।आमदनी थोड़ी बेहतर हुई तो गांव के दोस्त के किराए के कमरे से हटकर अपना कमरा लिया। पत्नी और बच्चों को साथ दिल्ली लाए। अभी पांच साल ही बीते थे कि अब गांव वापस जाने की बात करते हैं। लेकिन अगले ही पल कहते हैं, “वहां भी जाकर क्या करेंगे? कोरोना में गांव गए तो थे। वहां भी वही महंगाई और भुखमरी है।”


By Rohin Kumar, 30 Jun 2022


सब्ज़ी की रेहड़ी लगाने वाले संतोष महंगाई और हीटवेव दोनों की मार झेल रहे हैं। हीटवेव के कारण उनकी ताज़ी सब्ज़ियाँ कुछ ही घंटे में सूख जाती हैं।

संतोष बताते हैं कि कुछ सालों में उनके किराने का बिल एकाएक काफी बढ़ गया है। बताते हैं कि तीन लोगों के परिवार के लिए एक हफ्ते का किराना खरीदने मे 2 हजार रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं जो कि 2016 के मुकाबले दोगुना है। अपने खर्चे गिनवाते हुए संतोष हमें अपने महीने का गणित समझाने लगते हैं – तीन लोगों के परिवार को एक हफ्ते में बुनियादी सामान मसलन 5 लीटर दूध, 2 किलो चावल, 2 किलो आटा, आधा लीटर तेल, दाल और 2 किलो प्याज की जरूरत होती है। “फल तो बहुत समय से बंद है। गांव से अभी कुछ आम आया है, वही फल है। हरी सब्जियां भी थाली से गायब ही हैं। जिस सब्जी को किलो में खरीदना होता था, वह पाव में खरीद रहे हैं,” वह कहते हैं, “इसके अलावा रेहड़ी की कमाई का एक हिस्सा अगले दिन मंडी से सब्जियां खरीदने के लिए रखना पड़ता है। फिर और भी जरूरतें होती हैं जैसे मोबाइल का रिचार्ज, दवाइयां, बच्चे की स्टेशनरी और कई आकस्मिक जरूरतें। सबका बोझ महंगाई के कारण बढ़ गया है।”

“माल ढुलाई बढ़ेगी तो महंगाई बढ़ेगी। सब्जियों, फलों के दाम बढ़ेंगे। और माल ढ़ुलाई पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने से बढ़ते हैं,” संतोष महंगाई का बुनियादी विज्ञान बताते हैं।

होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) के मुताबिक, मार्च 2012 के मुकाबले मार्च 2022 यानी दस वर्षों में होलसेल सामानों की कीमतों में 68% की बढ़ोतरी हुई है। वहीं कंज्यूमर फूड प्राइस इंडेक्स यानी CPI के अनुसार, बुनियादी खाने-पीने वाले सामानों की कीमतों में मार्च 2014 के मुकाबले मार्च 2022 में 70% की बढ़ोतरी हुई है।

महंगाई में बढ़ोतरी का एक असर ये हुआ है कि बाजार में मिलावटी सामान धड़ल्ले से बिक रहे हैं। साथ ही ओरिजिनल कंपनियों के नाम से मिलते-जुलते नाम वाले प्रोडक्ट भी बाजार में उपलब्ध हैं जिनकी कीमतें कम हैं। इनकी गुणवत्ता को लेकर संदेह है। साथ ही होलसेल दुकानदारों का कहना है कि खाने-पीने की बुनियादी चीज़ों के दाम में बढ़ोतरी के मद्देनज़र ग्राहक छोटे सौ-ढ़ाई सौ ग्राम पैकेट खरीद रहे हैं। “पिछले छह महीनों का तकाजा है कि सरसों तेल के ढाई सौ ग्राम के डिब्बे हमने ज्यादा बेचे हैं। एक लीटर और पांच लीटर वाले डिब्बों की बिक्री में कमी है,” वजीराबाद मंडी में होलसेल किराना दुकान चलाने वाले सतीश कुमार कहते हैं।

महंगाई का असर अनौपचारिक (इनफॉर्मल) सेक्टर पर अधिक बुरा पड़ रहा है। इनफॉर्मल सेक्टर में कुछ कंपनियां डेली एलाउअंस (DA) देती हैं। लेकिन यह भी अक्सर एक फ्लैट निश्चित राशि होती है और कीमतों के सूचकांक में वृद्धि के आधार पर नहीं बदलती। मुद्रास्फीति के वर्तमान परिदृश्य में खाद्य मूल्य मुद्रास्फीति विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, मार्च 2021 में 3.94% से बढ़कर मार्च 2022 में 8.04% हो गई है।

बिहार के पटना और दिल्ली के वजीराबाद में थोक बाजारों में अनौपचारिक बातचीत से पता चलता है कि खाद्य पदार्थों की कीमतें – न केवल खाद्य तेल और दालें बल्कि अनाज भी महंगे होने से उपभोक्ताओं के महीने के राशन के खर्चे पर भी असर पड़ा है।

देश की एक बड़ी आबादी जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत अपनी खाद्य जरूरते पूरी करती हैं। पीडीएस अनौपचारिक मजदूरों को महंगाई से एक हद तक बचाता है। लेकिन अनाज के बंपर स्टॉक के बावजूद खुले बाजार में गेहूं और आटे का दाम बढ़ना सरकार के महंगाई रोकथाम के नीयतों पर शक गहरा करता है। सरकार चाहे तो रिजर्व में रखे स्टॉक को बाजारों में सस्ते दरों पर उपलब्ध करवा सकती है। इससे कीमतें भी नीचे आ सकती हैं।

पब्लिक हेल्थ पर काम करने वाली डॉ. मिलन सिन्हा बताती हैं कि महंगाई का संबंध सीधे गरीबी और कुपोषण से है। “कोविड के दौरान मीड डे मील स्कीम बंद होने के कारण हमने गांव देहात में देखा कि इसका कैसा असर हुआ था। एक तरफ बेरोजगारी पसरी है। मजदूरों को रोज का काम मिलना मुश्किल हो रहा है। जब काम नहीं मिलेगा तो थाली में रंग-बिरंगी सब्जियां नहीं पहुंच सकेगी। दूसरे तरफ अभी भी मीड डे मील स्कीम की गुणवत्ता पर संदेहास्पद स्थिति बनी रहती है। इन सबका असर पोषण पर पड़ता है। इसीलिए जरूरत है कि सरकार इस समय मीड डे मिल और आंगनबाड़ियों में कम से कम बच्चों और गर्भवती महिलाओं को केंद्र में रखकर पोषण की चुनौतियों से निपटें।”

नौकरीपेशा मीडिल क्लास ने भी शुरू की कटौतियां

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि महंगाई का असर सिर्फ लोअर मीडिल क्लास पर पड़ रहा है बल्कि नियमित सैलरी पाने वाला मीडिल क्लास भी इससे अछूता नहीं है।

‘टाइट बजट’ के कारण अभिषेक सिन्हा अपने बच्चों को समर छुट्टियों पर उनकी पसंदीदा जगह नहीं ले जा सके। वह कहते हैं, “लगभग दो साल कोविड ने खराब किया। कहीं जा नहीं सके। बच्चों के स्कूल इस बार खुले थे। वेकेशन में हमलोगों ने सोचा था कि कश्मीर जाएंगें। वहां कम से कम एक सप्ताह वादियों में बिताएंगें। लेकिन दिल्ली से श्रीनगर तक की फ्लाइट टिकटें इतनी महंगी हैं कि चार लोगों के परिवार के ट्रैवल पर ही पचास हज़ार से ज्यादा रूपये खर्च करने कीकी नौबत आ गई है।”

यह सच है कि विमान ईंधन (एटीएफ) की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। इसका एक बड़ा कारण रूस-यूक्रेन युद्ध को बताया जा रहा है। विमान के किराए में जेट फ्यूअल का खर्च लगभग 40 फीसदी तक होता है। विमान कंपनियां सरकार से गुजारिश कर रही हैं कि विमान किरायों की अपर लिमिट बढ़ा दी जाए। कंपनियों का कहना है कि अपर लिमिट बढ़ने से नुकसान की भरपाई एक हद तक संभव है।

भारत में महंगाई दर में आए इस तेज़ उछाल के पीछे ठोस घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय कारण थे। जहां एक ओर कच्चे तेल के भाव में आई वृद्धि ने खेल बिगाड़ा, वहीं  अंतर्राष्ट्रीय मोर्चे पर यूक्रेन-रूस युद्ध के कारण पूरी दुनिया में आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई है जिसने पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ाने का काम किया। नतीजतन रिज़र्व को अगस्त 2018 के बाद पहली बार रेपो रेट में 40 और 50 बेसिक प्वाइंट की बढ़ोतरी करनी पड़ी है। रेपो रेट महँगे होने का मतलब होता है कि उपभोक्ताओं को घर, कार, आदि के लिए दिया जाने वाला लोन महँगा हो गया है। दो बार बेसिस प्वाइंट बढ़े हैं यानी कुल 90 बेसिस प्वाइंट (100 बेसिस प्वाइंट का मतलब 1%) बढ़े हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफ़ेसर रेपो रेट बढ़ने से पड़ने वाले प्रभाव पर कहते हैं, “मैंने 50 लाख का होम लोन लिया है। जिसका मतलब हुआ कि अगर लोन 7 से 8 प्रतिशत (मतलब 1%) बढ़ता है और लोन की अवधि 15 साल की है तो मेरे लिए यह मासिक किस्त में 2841 रूपये बढ़ोतरी हो गई। जिसका अर्थ हुआ सालाना किस्त में लगभग 35 हज़ार की वृद्धि हो गई।”

फिलहाल नहीं दिख रही सिल्वर लाइनिंग

अनुमान लगाया जा रहा था कि जीएसटी के स्‍लैब में बदलाव कर 12 फीसदी के दायरे में आने वाले उत्‍पादों पर जीएसटी दर 15 फीसदी किया जाएगा जबकि 18 फीसदी वाले उत्‍पादों पर जीएसटी दर घटाकर 15 फीसदी किए जाने का प्रस्‍ताव था। लेकिन जीएसटी परिषद के सदस्‍य रहे वरिष्‍ठ भाजपा नेता और राज्यसभा सांसद सुशील मोदी ने कहा है कि उत्‍पादों पर दरों को बढ़ाने का यह सही समय नहीं है। उन्‍होंने कहा कि केरल सहित कई राज्‍यों ने लॉटरी पर समान टैक्‍स लगाने की सिफारिश की है जो कि विचारणीय है।

रिज़र्व बैंक के मौद्रिक नीति के प्रभारी डिप्टी गवर्नर माइकल पात्रा के मुताबिक़ अगले तीन तिमाहियों तक (मतलब इस पूरे वित्त वर्ष) खुदरा महंगाई दर 6% से ऊपर ही रहने की उम्मीद है। रिज़र्व बैंक की ही मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) के अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि बैंकों के ब्याज दरों में 150 बीपीएस यानी लगभग 1.5% की बढ़ोतरी और हो सकती है। जिसका मतलब हुआ कि होम लोन की दरें 9.5-10% तक जा सकती हैं। इसका सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।  प्रोफेसर को 50 लाख के होम लोन पर हर महीने 5,000 रूपये का अतिरिक्त भार उठाना पड़ सकता है।

रेटिंग एजेंसी मूडीज़ ने भी चालू वित्त वर्ष में भारत में जीडीपी बढ़ने का अनुमान 9.1% से घटाकर 8.8% कर दिया है। एजेंसी का यह भी कहना है कि महंगाई काबू करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने से बाज़ार में मांग कम होने का भी डर है। हालाँकि मूडीज़ का यह भी अनुमान है कि अगर अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में महंगाई और तेज़ी से नहीं बढ़ती है तो भारत की अर्थव्यवस्था अपनी रफ्तार बनाए रख सकती है।