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सिद्धू मूसेवाला के प्रतिबंधित SYL के मार्फ़त पंजाब में गहराते जल संकट पर बात

कई सरकारी एवं गैर-सरकारी अध्ययनों के अनुसार पंजाब में सूखा पड़ने का ख़तरा है। और सूखे का खतरा हरियाणा को भी है इसीलिए वे लिंक कनाल की मांग करते हैं। जबकि दोनों तरफ आज ऐसी आबादी भी है जो विशेषज्ञों के राय से ताल्लुक रखती है कि पानी का संकट एक साझा संकट है और उसका उपाय महज सतलज यमुना लिंक कनाल नहीं है।


By रोहिण कुमार, 15 Jul 2022


पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला भले ही दुनिया को अलविदा कह गए हो लेकिन उनका सतलज यमुना लिंक कनाल से संबंधित नया गाना पंजाब के लोगों के दिलों-दिमाग पर एक अलग छाप छोड़ चुका है। वहीं दूसरी तरफ सरकार गाने से ऐसी व्याकुल हुई कि चौबीस घंटे के भीतर ही ‘क़ानूनी शिकायत’ के बाद इस गाने को यूट्यूब इंडिया से प्रतिबंधित कर दिया गया। आखिर सतलुज-यमुना लिंक नहर पर लिखे इस गाने में ऐसा क्या था?

गाने की शुरुआत होती है आम आदमी पार्टी हरियाणा के राज्य सभा सदस्य सुशील गुप्ता के बयान से। गुप्ता कहते हुए सुनाई पड़ते हैं, “हमारी सरकार पंजाब में बन गई है। 2024 में हरियाणा में भी हमारी सरकार आ रही है। 2025 में हरियाणा के हर खेत में पानी पहुंचेगा यह हमारा वादा है।”

दरअसल, 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पटियाला के कपूरी गांव में सतलुज यमुना लिंक कनाल (नहर) परियोजना की घोषणा की थी। इसके तहत 214 किलोमीटर लंबी नहर (122 किलोमीटर पंजाब में और 92 किलोमीटर हरियाणा में) बननी है। पंजाब से सतलुज को हरियाणा में यमुना नदी से जोड़ा जाना है। हरियाणा समान वितरण के सिद्धांत मुताबिक कुल 7.2 मिलियन एकड़ फीट पानी में से 4.2 मिलियन एकड़ फीट हिस्से पर दावा करता रहा है लेकिन पंजाब सरकार इसके लिए राजी नहीं है। हरियाणा ने केंद्र का दरवाजा खटखटाया और साल 1976 में केंद्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी की जिसके तहत हरियाणा को 3.5 मिलियन एकड़ फीट पानी का आवंटन किया गया।तर्क दिया गया कि सतलज यमुना लिंक कनाल से हरियाणा के दक्षिणी हिस्से की बंजर जमीन को सींचा जा सकेगा। परियोजना के तहत हरियाणा के हिस्से में बनने वाला नहर तैयार किया जा चुका है लेकिन पंजाब में यह काम दशकों से रूका पड़ा है।

सतलज यमुना लिंक कनाल पंजाब के लिए घोर राजनीतिक और संवेदनशील मुद्दा है। इसकी जड़ें खालिस्तान आंदोलन से भी जुड़ती हैं। कहते हैं कि इंदिरा गांधी द्वारा कनाल परियोजना की घोषणा के बाद से ही संत हरचंद सिंह लोंगोवाल के नेतृत्व में शिरोमणि अकाली दल ने इसका विरोध शुरू कर दिया था। पर राजीव गांधी की सरकार के दौरान संत हरचंद सिंह लोंगोवाल ने कई मुद्दों के साथ यमुना सतलज लिंक के मुद्दे पर भी सरकार से समझौता कर लिया। इसके मुताबिक अगस्त 1986 तक नहर निर्माण का कार्य पूरा किया जाना था। 24 जुलाई 1985 को यह समझौता हुआ और एक महीने के भीतर ही 20 अगस्त 1985 को उनकी हत्या कर दी गई। जब नहर बनाने की बात वापस तूल पकड़ने लगी तो 1990 में कट्टरपंथी सिख नेता बलविंदर सिंह जट्टाना, बलबीर सिंह फ़ौजी, जगतार सिंह पंजोला, और हरमीत सिंह सतलज यमुना लिंक कनाल के चंडीगढ़ दफ्तर पहुंचे और चीफ़ इंजीनियर एमएस सिकरी और अवतार औलख का क़त्ल कर दिया।

तब से यह परियोजना अधर में लटक गई। कोई भी राजनेता इस मुद्दे को हाथ लगाने से बचता है।  इस मसले को लेकर दोनों ही राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट जा चुकी है। हरियाणा बार-बार कोर्ट से आग्रह करता रहा है कि कोर्ट पंजाब पर नहर बनाने का काम पूरा करने के लिए दबाव बनाए।सिद्धू अपने गीत में बलविंदर सिंह जट्टाना का भी ज़िक्र करते हैं जिसे पंजाब के एक बड़ी आबादी के बीच ‘हीरो’ की सोहबत प्राप्त है। वहीं हरियाणा के गायकों ने सिद्धू के गाने पर आपत्ति जताई है।

ख़ैर, वर्षों से अटके परियोजना को पूरा करने के लिए 2004 में केंद्र ने अपनी एक एजेंसी को निर्माण कार्य सौंपने का निर्णय लिया। लेकिन लगभग एक महीने बाद ही पंजाब विधानसभा ने एक कानून लाकर जल बंटवारे से जुड़े सभी समझौतों को खत्म कर दिया। तब से यह मामला और भी पेचीदा हो गया है। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह नहर बनाने की बात तो किया करते लेकिन राज्य में हिंसा भड़कने की आशंका से इसे शुरू नहीं करवा सके। 2020 में कोर्ट ने यहां तक टिप्पणी की थी कि यदि संभव है तो दोनों प्रदेशों के मुख्यमंत्री साथ में बैठकर बातचीत करें और बताएं कि समस्या का हल निकाल सकते हैं या नहीं। लेकिन फिर भी बात नहीं बनी।

पंजाब में गहराता जल संकट

पंजाब के विरोध का मूल कारण है कि कई सरकारी एवं गैर-सरकारी अध्ययनों के अनुसार पंजाब में सूखा पड़ने का ख़तरा है। और ठीक यही कारण है कि हरियाणा पानी की मांग कर रहा है। सूखे का खतरा हरियाणा को भी है इसीलिए वे लिंक कनाल की मांग करते हैं। जबकि दोनों तरफ आज ऐसी आबादी भी है जो एक्सपर्ट्स के राय से ताल्लुक रखती है कि पानी का संकट एक साझा संकट है और उसका उपाय महज सतलज यमुना लिंक कनाल से नहीं किया जा सकता। ध्यान रहे कि हरित क्रांति का सबसे ज्यादा फायदा पंजाब और हरियाणा को ही हुआ था। खेती का मशीनीकरण हुआ।  हाई यील्ड वैराइटी (उच्च उपज वाली किस्म) के बीज, रसायनिक खाद और उवर्रकों का इस्तेमाल खेती में बढ़ता चला गया। फसलों की उपज बढ़ी और किसानों को तात्कालिक लाभ भी मिला। जबकि हरित क्रांति के दीर्घकालिक असर को लेकर एमएस स्वामिनाथन और वंदना शिवा जैसे कृषि विशेषज्ञों ने जो आशंकाएं जताई थी, वही अब पंजाब और हरियाणा में होता दिख रहा है। चूंकि पंजाब – पंज (पांच) और आब (नदी) से मिलकर बना है, जिसका मतलब है पांच नदियां इस क्षेत्र से गुजरती है, बावजूद इसके पंजाब में जल संकट गहराता जा रहा है इसीलिए यहां हम पंजाब पर फोकस करेंगे।

अक्सर अक्टूबर-नवंबर में पराली जलाने की खबरें सुर्खियों में रहती है। स्मॉग से पटे शहरों की तस्वीरें हर साल की जैसे रीत बन चुके हैं। लेकिन रोचक है कि जिसे वायु प्रदूषण भर का मुद्दा समझा जाता है, उस पराली की समस्या की जड़े भी पानी से ही जुड़ी है। दरअसल पंजाब सरकार के पंजाब प्रिजर्वेशन ऑफ सबसॉइल वॉटर एक्ट, 2009 के अनुसार पंजाब के किसानों को साल के 10 मई के पहले धान की बुवाई करने से मना किया गया है। 2009 में राज्य सरकार ने यह फैसला तेजी से भू-जल के गिरते स्तर के मद्देनज़र लिया था। चूंकि धान की फसल को अत्यधिक पानी चाहिए होता है, सरकार ने पानी की निर्भरता मानसून से पूरी करने की अपील की। इस कानून के पहले तक किसान राबी की फसल के तुरंत बाद धान की बुवाई करते थे। भूमिगत जल से उसकी सिंचाई की जाती थी।

बटिण्डा के अकलजोत सिंह, पेशे से किसान इस कानून के संबंध में दो महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं – “पहला, सरकार किसानों को कैसे बता सकती है वे कौन सी फसल कब लगाएंगें? दूसरा, जब  पंजाब में चावल की खपत ही नहीं है तो धान हमारे ही यहां सबसे ज्यादा क्यों उगाया जा रहा है? क्यों नहीं सरकार धान के मुकाबले दूसरी फसलों (जिसमें कम पानी की खपत होती है) को उचित समर्थन मूल्य देकर प्रोत्साहित करती है?” युवा किसान बलविंदर सिंह भी अकलजोत की बात से सहमति जताते हुए कहते है, “पराली-पराली नहीं वीरे (बड़े भाई), पानी-पानी चीखने की जरूरत है। पानी की वजह से ही हमलोग फसल चक्र में जरूरी बदलाव नहीं कर पाते। सरकार को सर्वप्रथम पानी की समस्या पर ध्यान देने की जरूरत है।”

वर्ष 2018 में नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलप्मेंट (नाबार्ड) ने अपने शोध में स्पष्ट रूप से पंजाब और हरियाणा के संदर्भ में बताया कि दोनों राज्यों में धान और गेहूं की खेती को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। दोनों राज्यों में धान की खेती समावेशी सिंचाई नीतियों के लिहाज से भी बेहतर नहीं है। सिंचाई के लिए बोरवेल के इस्तेमाल से भूमिगत जल के स्तर पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। अगर पंजाब के ही मालवा क्षेत्र की बात करें तो यहां तकरीबन 200 से 400 फीट की गहराई पर बोरिंग आम हो गई है। वहीं खेतों में रसायनों का अत्यधिक इस्तेमाल हो रहा है। जब बोरवेल एक खास प्रेशर के साथ पानी खिंचता है तो वह सक्शन के कारण पानी की  टॉक्सिसिटी (रसायनिकता) को और ज्यादा बढ़ा देता है। यह खेतों के साथ-साथ पीने के लिए भी हानिकारक है। लोगों का दावा है कि मालवा क्षेत्र में कैंसर के प्रमुख कारणों में से एक पानी है।

खेती विरासत मिशन से जुड़े जगमोहन सिंह बताते हैं कि पानी की समस्या के लिए खेती की पद्धति में भी बदलाव करने की जरूरत है, “जैविक खेती एक उपाय है। पराली की समस्या से तो छुटकारा मिलेगा ही, इस पराली का प्रयोग ‘मल्चिंग’ में भी किया जा सकता है। इससे मिट्टी में नमी बरकरार रहेगी। मिट्टी में पानी सोखने की क्षमता बढ़ेगी। फिलहाल जो पंजाब की मिट्टी है, वह अत्याधिक रसायनिक खाद डालने के कारण मृतप्राय हो चुकी है। ऐसे खेतों के  पटवन (सिंचाई) में पानी की खपत काफी ज्यादा होती है। चूंकि मिट्टी स्वस्थ नहीं है तो पौधों की जड़ें मजबूत नहीं होती। हल्की सी आंधी में पौधे झुक जाते हैं। मित्र कीटों (मिट्टी के लिए लाभदायक कीड़े-मकौड़े) की मौजूदगी बढ़ती है।”

हालांकि सिद्धू मूसेवाले के गाने में ग़ैर विभाजित पंजाब का जिक्र आता है जिसे लेकर हरियाणा और हिमाचल से आलोचनाएं दर्ज की गई हैं। पानी की राजनीति पर पंजाबी सेंटिमेंट्स के संदर्भ में सिद्धू लिखते हैं – “पानी दा की ऐ, पानी तां पुलां थल्लों वगना, सानू नाल रला लो लख पावें, थलले नी लगना, हो दबके दे नाल मंगदे हो असी तां नी दिन्दे, ओना चिर पानी छड्डो तुपका नी दिन्दे…” यानी पानी का क्या है, पानी तो पुलों के नीचे बहेगा, हमारे साथ प्यार से रह लो मगर हम झुकेंगे नहीं, तुम ज़बरदस्ती कर के मांगते हो तभी नहीं देते, तब तक पानी छोड़ो एक बूंद भी नहीं देंगे…”

गाना अंत में लोगों से अपील करता है कि सभी पंजाब की नदियों को बचाने और पंजाब को रेगिस्तान बनने से रोकने के संघर्ष में साथ आए। साथ ही जम्मू और कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का सिखों के राजनीतिक महत्व के संबंध में दिए बयान के हवाले से चेतावनी भरे लहजे में संदेश भी छोड़ जाता है कि ‘सिख’ अपनी मांगों के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।

फिलहाल सतलज यमुना लिंक कनाल का मुद्दा सिद्धू मूसेवाला के गाने से वापस चर्चा में जरूर आ गया है लेकिन अगले वर्ष हरियाणा चुनावों के मुद्देनज़र इस मुद्दे के तूल पकड़ने के आसार हैं। इसीलिए भी क्योंकि आम आदमी पार्टी ने हरियाणा में वादा किया है कि वे सतलज यमुना लिंक कनाल का मुद्दा सुलझायेंगे और हर खेत मे पानी पहुंचाएंगें। जबकि पंजाब में उनकी सरकार सत्ता में है। क्या पंजाब की कीमत पर हरियाणा को ‘न्याय’ देगी आम आदमी पार्टी?