Ground Reports

सामाजिक अन्याय और रूढ़ियों की परतों तले दबा पहाड़ी गांवों की लड़कियों का भविष्य

बीते कुछ वर्षों में हमने पहाड़ी राज्यों विशेष कर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में होने वाली प्राकृतिक घटनाओं को लेकर ख़बरों में बढ़ोत्तरी देखी है। ये पहाड़ी राज्य सबसे ज्यादा चर्चा में क्यों रहते हैं?


By Adarsh Pal, 4 Sep 2022


अपने खूबसूरत प्राकृतिक वातावरण की वजह से न जाने कितने सैलानियों को ये पहाड़ी राज्य अपने पास बुला लेते हैं या यूँ कहें कि ज्यादा संख्या में सैलानी पहाड़ों पर जाकर वहां के प्राकृतिक संतुलन का मजाक बना रहे हैं। ऐसी ख़बरों कि वजह से ये राज्य आजकल ख़बरों में रहते हैं लेकिन यहां रहने वाले लोगों के जीवन कि समस्याएं जैसे स्कूल, अस्पताल, बिजली और अन्य मूलभूत समस्याओं को लेकर शायद ही कभी कोई खबर देखने को मिलती हो।

1997 में अल्मोड़ा से अलग करके एक नया जिला बनाया गया जिसका मुख्य उद्देश्य था कि बागेश्वर और आसपास के गांवों में विकास की रफ़्तार तेज हो सके। विकास की रफ़्तार को तेज़ी देने के लिए इस नए जिले को 3 विकास खंड में विभाजित किया गया है लेकिन अभी भी यह जिला काफी समस्याओं से जूझ रहा है। ‘गरुण’ विकास खंड के एक गांव ‘चोरसों’ में रहने वाली वाली लड़कियां विकास और समाज की अवधारणा के बारे में बात करते हुए कहती हैं कि उन्हें अपने सपनों को पूरे करने के अवसर ही नहीं मिलते तो कहां से ये सोंचे कि विकास क्या है और कैसे उनका विकास होगा।

विकास के मुद्दों पर कितने ही चुनाव उत्तराखंड में लड़े गए होंगे और इन्ही मुद्दों पर यहाँ के लोगो ने वोट भी दिए होंगे लेकिन क्या ये सवाल किसी के मन में नहीं आया होगा कि किस तरह का विकास वो चाह रहे हैं। ‘चोरसों’ गांव कि लड़कियां कहती हैं कि स्कूल जाने वाली सड़क अच्छी हो जाये और बाजार तक उनकी पहुँच हो जाये तो उन्हें लगेगा कि विकास हो रहा है।

‘कपकोट’ विकास खंड के एक गांव ‘उत्तारौड़ा’ गांव कि रहने वाली लड़कियां लैंगिक असमानता पर काफी बेबाकी से अपने जवाब देती हैं और कई परम्पराओं पर सवाल भी करती हैं। इसी गांव कि चित्रा कहती हैं कि ये बात तो हमने भी स्वीकार कर ली है कि बहुत सारी असुविधाओं का सामना तो हमको इस वजह से करना पड़ता है क्योंकि हम लड़की हैं। ऐसा नहीं है कि हम लड़कियां पढ़कर नौकरियां नहीं कर सकते लेकिन कितनी कम ही लड़कियां ऐसा कर पाती हैं इसका एक ही कारण है कि जितने मौके लड़कों को मिलते हैं उतने मौके न तो हमको मिलते हैं और न ही उतने पैसा हम पर खर्च किये जाते हैं।

आजादी के बाद सामाजिक लोकतंत्र का ज़िक्र डॉ अम्बेडकर लगातार संविधान सभा कि बैठकों में कर रहे थे और इस एक विषय पर काफी बहस भी सभा में होती रही कि कैसे सामाजिक लोकतंत्र को हासिल किया जाये।तब बहसों का निष्कर्ष यही निकला कि इतने वर्षों से जिसे भी उसकी पहचान के आधार पर शोषण का शिकार होना पड़ा है उन्हें अब मुख्यधारा में शामिल होने दिया जाये और समाजिक न्याय की ओर समाज को अग्रसर करके जन-सरोकार की राजनीति की जाए।

लेकिन फिर भी ऐसे तमाम सिद्धांतों को पीछे छोड़ते हुए हमने अपने समाज के अंदर न जाने कितने ही खोखले विचारों, रूढ़िवादी परम्पराओं को शह दे रखी है जिनकी वजह से देश की न जाने कितनी लड़कियाँ अपने सपनों को साकार करने में मुश्किलें झेलती है।

विकास की परिभाषाएं कितनी भी हो सकती हैं लेकिन इसका उद्देश्य हमेशा से एक ही रहा है की समाज के हर व्यक्ति को उसके मुताबिक अपने फैसले लेने, अवसरों को चुनने की आजादी हो। इसके साथ-साथ खुद की जीवनशैली की गुणवत्ता में सुधार भी इसका एक पहलू है ।

लेकिन क्या विकास के जो उद्देश्य हैं वो अपनी पहुँच उत्तराखंड के इस जिले में बना पाए हैं इसका जवाब तो तब मिलता है जब कुमाऊं सीमा के अंतिम गांव बघर तक का सफर तय हो पाता है। बघर भी कपकोट विकास खंड का ही एक गाँव है लेकिन उत्तरौडा जैसे गांवों से बिल्कुल अलग क्योंकि कनेक्टिविटी की समस्या से जूझता ये गांव बहुत अलग-थलग और हाशियाकृत होकर रह गया है।

गांव में न तो आंगनवाड़ी कार्यरत है और न ही गांव में किसी भी प्रकार का नेटवर्क आता है, दरअसल एक पहाड़ी में बसे इस गांव तक पहुँचने के लिए जिन रास्तों से होकर जाना होता है वो इतने संकरे और जोखिम भरें हैं कि सुविधाएं बहुत मुश्किलों से ही पहुँचती हैं यहां।

गांव की रहने वाली सरिता (बदला हुआ नाम) जिन्होंने बारहवीं तक की पढ़ाई पूरी कर ली है कहती हैं कि आगे की पढाई का कुछ भरोसा नहीं है क्योंकि घर वालों का कहना है अब और आगे पढ़ लिखकर क्या करेगी। सरिता का सपना है कि वो पुलिस कि नौकरी करें। वह अपने गांव में जागरूकता फैलाना चाहती है कि शिक्षा सबका अधिकार है और किसी भी काम को लेकर लड़कों और लड़कियों में भेदभाव न किया जाए।

सरिता का मानना है कि उनके गांव में लड़कियों को बहुत सारे अधिकारों से वंचित रहना पड़ता है । इसके साथ-साथ कुछ कुरीतियों ने अभी भी उनके गांव को जकड़ रखा है जैसे- माहवारी के दौरान पूरे एक हफ्ते लड़की को घर के बाहर रहना पड़ता है और इसके साथ-साथ छुआछूत का भी सामना करना पड़ता है।

गांव कि लड़कियां मानती हैं कि ऐसा सब जगह होता है और उनको कभी इस बात का एहसास नहीं हो पाया कि ये परम्परा गलत है और एक तरह से लिंग आधारित भेदभाव है। यहां लड़कियों से बात करते हुए ये बात सामने निकल कर आयी कि उन्हें लगता है उनकी सभी समस्याएं दोहरी हैं: पहली कि उन्होंने ऐसी जगह जन्म लिया जो सुविधाओं से बहुत दूर है और दूसरी ये कि उन्होंने एक लड़की के रूप में जन्म लिया है।

बागेश्वर जिले के 2 विकास खण्डों के 7 गांवों में लड़कियों से बात करके उनके गांवों में उनके द्वारा महसूस की जाने वाली समस्याओं के बारे में बात करके और उन समस्याओं का उनके लड़की होने से पड़ने वाले प्रभाव जानने पर यह कहना कदाचित गलत नहीं होगा कि समस्याओं का समाज में असर ‘पहचान’ (आइडेंटिटी) के साथ बढ़ता और घटता है।

कनेक्टिविटी और अन्य मूलभूत समस्यों से जूझ रहे इन गांवों में विकास की तीव्रता मापना और ऐसे कारकों को ढूंढना जोकि विकास में बाधा हैं, आपको अन्य सामाजिक समस्याओं की तरफ भी ले जायेंगे। किशोरी बालिकाओं का ये कहना की उनके समस्याएं दोहरी हैं इस बात का इशारा हैं की विकास और विकास कि योजनाओ का क्रियान्वयन भी दोहरा है।

इन सभी गांवों कि लड़कियों को उम्मीद है कि एक दिन वो सारे अवसर जिनसे वो वंचित हैं वो उन्हें मिलने लग जायेंगे।