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उपेक्षा के शिकार यमुना के गोताखोर

“यहां कोई भी आकर हमें गाली बक देता है, यहाँ तक कि कोई मार भी देता है हमें। हम किसे बोलेंगे? कौन करेगा हमारी सुनवाई?” इतना कहते हुए मोहम्मद जाकिर का गला भर आता है। उपेक्षित होने और उपेक्षित होकर जीने की वेदना उसके चेहरे पर साफ पढ़ी जा सकती है । जाकिर की आँखें उदास हैं और बात करते हुए उठते हाथों में एक तरह की हताशा झलक जाती है।


By Shivam Khanna and Deepak Yatri, 27 Aug 2022


जाकिर, हमारे बीच से ही एक अदना सा इंसान है। पांच फूट की कद-काठी के इस इंसान की जिंदगी मगर इतनी आसान नहीं है। यह पिछले 30 सालों से, आईटीओ यमुना छठ घाट पर गोताखोरी करके अपना जीवनयापन करता हैं और यही एक मात्र जरिया है उसके पूरे परिवार के भरन-पोषण का। पानी के ऊपर तैरते जहरीले फोम में उतरना और गोता लगाकर अपने लिए रोटी जुगाड़ना जाकिर और उसके भाईयों के लिए रोज का काम है। अपनी जान हथेली पर रखकर, नदी की गहराइयों में गोता लगाने का यह सौदा बड़ा ही महंगा है। मगर यह जोखिम उसे हर दिन उठाना पड़ता है।

 इनका बचपन दिल्ली की ही झुग्गियों में बीता। अभाव और गरीबी ने इन्हें बचपन से ही अपने लिए दाना-पानी ढूंढ़ने को विवश कर दिया और यही पेट की भूख उन्हें कई रास्तों से गुजारती हुई धीरे धीरे यमुना के किनारे ले आई। सबसे पहला काम जो इन्होंने यहां सीखा वह था लोगों के द्वारा नदी में श्रद्धा के रुप में फेंके जाने वाले चंद सिक्कों को डुबकी लगाकर ढूंढ़ना। बाद में इन्हें नदी के बीच जाकर अस्थियाँ विसर्जित करने की रकम थोड़ी बहुत मिलने लगी। अब यह एक तरह से इनके जीवन यापन का जरिया हो गया था। कई बार मूर्तियाँ विसर्जित करने के एवज में भी इन्हें कुछ पैसे मिलने लगे। मगर इनका काम यहीं नहीं रुकता। नदी से कई बार लाश मिलने पर उन्हें निकालने का काम भी इन्हीं के जिम्मे आता है। मगर इसके एवज में इन्हें मुश्किल से दो-तीन सौ रुपए ही मिल पाते हैं।  

“हम तीन लोग रहते हैं। एक तरह से कह लीजिए कि हम तीन भाई जैसे रहते हैं इस नदी किनारे । सबसे बड़े वाले का नाम लाल मन है, उससे छोटे हैं राशिद,” जाकीर बताते है, “हम यमुना से ही ज्यादा काम ढूंढ़ते हैं। अब जबकि नदी में प्रदूषण ज्यादा हो गया है तो दिक्कत बढ़ गई है। कभी कभी तो बहुत उल्टियाँ होती हैं और साँस लेने में भी दिक्कत होने लगती है।”

इन्हें पूरे दिन नदी में डुबकी लगाकर 35-50 रुपए मिलते है मगर कभी कभी यह सौ रुपये तक कमा लेते है। यहां इन्होंने एक छोटी सी झोपड़ी बना रखी है जो इनका धूप और बारिश से बचाव करते हैं। मगर इनकी यह झोपड़ी भी कुछ लोगों और संस्थाओं की आंखों में चुभती है। ऐसी संस्थाओं का मानना है कि इस वजह से गंदगी ज्यादा होती है मगर ऐसा बिल्कुल नहीं है।

बुनियादी सुविधाओं की बात करें तो इनके आसपास पीने का पानी भी बहुत मुश्किल से मिलता है। कहीं ना कहीं से जुगाड़ कर यह अपने लिए पीने के पानी का जुगाड़ करते हैं। मगर बात यहीं तक नहीं रुकती कई बार तो यह कुछ संस्थाओँ से ठगी के शिकार भी हुए हैं।

जाकिर अपने पिता के नक्शेकदम पर चलने वाला व्यक्ति हैं जो जीवन भर यहीं रहा हैं। उसके मुताबिक अगर उसे अपने काम के लिए लाइसेंस मिल जाता है तो यह राहत की बात होगी, सिर्फ इसलिए नहीं कि यह आय का एक निरंतर स्रोत बन जाएगा, बल्कि मुख्य रूप से इसलिए कि उसे सम्मान मिलेगा। 

जाकिर ने दावा किया कि दूसरे घाटों पर गोताखोरों के पास लाइसेंस हैं। पुलिस उनके काम से वाकिफ है। साक्षात्कार के दौरान भी जाकिर को पुलिस स्टेशन से एक महिला को नदी से बाहर निकालने में मदद करने के लिए फोन आया, और फिर भी उनके लाइसेंस के लिए कागजी कारवाई पूर्ववत बनी हुई है। जाकिर इंस्टाग्राम पर सक्रिय हैं, जहां वह अपने और अपने भाइयों के घाट की सफाई के वीडियो डालते हैं और अधिकारियों को भी अपने हैशटैग में शामिल करते हैं। लेकिन विडंबना है कि आज तक उसकी याचिका अनसुनी रही है।

लाल मन बताते है, “एक बार एक संस्था ने हम तीनों को 10-10 हजार रुपए देने का वादा किया था वह भी तीन महीने तक मगर जब तीन महीने पूरे हुए तो उन्होंने हमें सिर्फ़ 7 हजार रुपये पकड़ा दिए। जब हमने कहा कि वादा कुछ और ही किया था तो उन्होंने हमें धमकी भरे अंदाज में हमें चुप कराने की कोशिश की। लेकिन इन सबके बावजूद हमने नि:स्वार्थ भाव से सैकड़ों लोगों को यमुना में डूबने से बचाया है।”

वह आगे बताते है, “कई बार तो लाशें भी हमने निकाली हैं यमुना से। मगर फिर भी हम उपेक्षित हैं पूरे समाज के लिए और हमारी हालत बदलना तो दूर, हमारे काम की कद्र तक करने वाले कहीं नजर नहीं आते।”

यह पूछने पर कि क्या यह काम वह इतनी मुश्किलों के बावजूद जारी रखेंगे? तो लाल मान बड़ा ही भावुक सा जवाब देते हुए कहते हैं- “मैं अपना सारा जीवन यमुना माता के पास बिताऊंगा, भले ही मैं या मेरे बच्चे अमीर हो जाएं, मैं यहां रहा हूं और मां यमुना की सेवा में ही मर जाऊंगा”।