Headline

झारखंड में चढ़ा सियासी पारा: खतरे में हेमंत सोरेन की विधायकी, ‘ऑपरेशन लोटस’ की चर्चाएं तेज़

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के ऊपर पद के दुरूपयोग मामले में चुनाव आयोग ने कथित तौर पर सदस्यता खत्म करने की भेजी सिफारिश। पद पर रहते हुए स्टोन माइंस की लीज़ अपने नाम आवंटित कराने का है आरोप।


By Rohin Kumar, 26 Aug 2022



जिस रोज़ बिहार में नयी सरकार का विधानसभा में फ्लोर टेस्ट होना था, उसी दिन सुबह से लालू प्रसाद के करीबियों के घर पर एजेंसियों के आ धमकने की खबरें आने लगी थीं। सारी नज़रें बिहार पर थीं कि अचानक झारखंड से आई एक खबर राष्ट्रीय पटल पर छा गई। खबर यह कि चुनाव आयोग ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की विधायकी रद्द करने की सिफारिश राज्यपाल रमेश बैस से की है। पूरे प्रकरण में दिलचस्प यह भी रहा कि हेमंत सोरेन या राज्यपाल का खत मीडिया के पास कैसे पहुंचा?

हालांकि, राजभवन की ओर से मीडिया में चल रही खबरों का कोई खंडन भी जारी नहीं किया गया है। अटकलें लगाई जा रही हैं कि चुनाव आयोग ने हेमंत सोरेन को लोक जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 9-ए के उल्लंघन का दोषी पाया है। इस खबर ने झारखंड के सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है।

“जब चुनाव आयोग की रिपोर्ट सीलबंद लिफ़ाफ़े में भेजी गई है तो मीडिया के पास यह खत कैसे पहुंचा? क्या भाजपा के नेताओं और मीडिया के लोगों ने वह रिपोर्ट तैयार की है,” मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने तंज कसते हुए कहा, “ऐसा लगता है कि बीजेपी के एक सांसद और उनसे जुड़े मीडिया के लोगों ने ही चुनाव आयोग की रिपोर्ट का ड्राफ्ट तैयार किया है। भाजपा  ने संवैधानिक संस्थाओं और सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग और उसपर शर्मनाक तरीके से नियंत्रण कर लिया है। ऐसा भारत के लोकतंत्र में पहले कभी नहीं देखा गया।”

इस सियासी उठापटक के बीच मुख्यमंत्री सोरेन और उनकी पार्टी के विधायक लगातार इस बात पर ज़ोर डाल रहे हैं कि चाहे सरकार को अस्थिर करने की कितनी भी साजिशें चलती रहें वे झारखंड के विकास के लिए काम करते रहेंगे। मीडिया से बातचीत करते हुए भी हेमंत सोरेन ने कहा कि वे राज्य में कल भी काम कर रहे थे और आज भी कर रहे हैं।

खुद हेमंत सोरेन ने भी एक वीडियो ट्वीट किया जिसमें पुलिसकर्मी उनके समर्थन में नारे लगाते देखे जा सकते हैं। इस ट्वीट में वह लिखते हैं, “संवैधानिक संस्थानों को तो खरीद लोगे, जनसमर्थन कैसे खरीद पाओगे?”

हेमंत सोरेन पर आरोप

इसी साल फरवरी में पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास ने आरोप लगाया कि हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री और खनन मंत्री रहते हुए अपने पद का कथित तौर पर दुरुपयोग किया है। रघुबर दास के आरोप के अनुसार, हेमंत सोरेन ने अपने पद पर रहते हुए एक स्टोन माइंस की लीज़ को अपने नाम आवंटित कर लिया था। यह लोक जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 9-ए का उल्लंघन है। तब प्रेस कॉन्फ्रेंस करके रघुबर दास ने इससे संबंधित कई कागज़ात भी मीडिया से साझा किए थे। वे भाजपा के दूसरे नेताओं के साथ राजभवन गए थे और राज्यपाल रमेश बैस से मिलकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की विधानसभा सदस्यता खत्म करने की मांग की थी।

राज्यपाल ने उस शिकायत की प्रति चुनाव आयोग को भेजकर उनसे मंतव्य देने को कहा था। चुनाव आयोग ने इसकी सुनवाई शुरू कर शिकायतकर्ता और आरोपित दोनों को नोटिस भेजकर अपना-अपना पक्ष रखने को कहा था। दोनों पक्षों के जवाब हासिल करने और कई तारीखों के बाद चुनाव आयोग ने इसी महीने अपनी सुनवाई पूरी की। अब चर्चा है कि आयोग ने अपनी सिफारिश राज्यपाल को भेज दी है और राज्यपाल को इस पर फैसला लेना है।

हालांकि मुख्यमंत्री सोरेन का पक्ष है कि जिस कथित ख़नन पट्टे की बात भाजपा कर रही है, उसका आवेदन उन्होंने कई साल पहले किया था। तब वे लाभ के किसी पद पर नहीं थे। एक तथ्य यह भी है कि पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास द्वारा इस मामले को उछाले जाने के बाद सोरेन ने खनन की लीज सरेंडर कर दी और उसपर कोई खनन नहीं हुआ है। इसी आधार पर सोरेन का कहना है कि यह लाभ के पद के दुरुपयोग का मामला है ही नहीं और उनकी विधानसभा सदस्यता को रद्द नहीं किया जा सकता।

भाजपा का आरोप हेमंत सोरेन के भाई और दुमका विधायक बसंत सोरेन पर भी है कि उन्होंने भी लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के प्रावधानों का उल्लंघन किया है। दरअसल मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने साल 2019 में हुए विधानसभा चुनाव में संथाल परगना की बरहेट और दुमका दोनों सीटों से जीत हासिल की थी। बाद में उन्होंने दुमका सीट से इस्तीफा दे दिया था। फिर दुमका सीट पर उपचुनाव हुए और उनके छोटे भाई बसंत सोरेन की उस सीट पर जीत हुई। यह मामला भी चुनाव आयोग में लंबित है।

क्या झारखंड में भी होगा ऑपरेश लोटस?

जिस दिन हेमंत सोरेन की विधायकी रद्द करने की कथित सिफारिश भेजी गई, उसी दिन दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने  भाजपा पर आरोप लगाया कि उनकी सरकार को गिराने के लिए उनके विधायकों को भाजपा की ओर से 20-20 करोड़ का ऑफर दिया गया है। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने आरोप लगाया कि उन्हें पार्टी तोड़ने और मुख्यमंत्री बनाने की पेशकश भाजपा की तरफ़ से की गई है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि गैर-बीजेपी शासित राज्यों में भाजपा पर ऑपरेशन लोटस के तहत सरकार गिराने के आरोप लगाए गए हो। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गोवा जैसे राज्य इसका उदाहरण रहे हैं।

झारखंड में हुए इस सियासी घटनाक्रम के बाद यह चर्चा और तेज़ हो गई है कि क्या भाजपा झारखंड में भी ऑपरेशन लोटस की तैयारी में जुटी है। कई मौकों पर भाजपा नेताओं की तरफ से यह कहा जा चुका है कि झारखंड में सोरेन की सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएगी।

कांग्रेस ने भी पहले भाजपा पर झारखंड में सरकार गिराने के आरोप लगाए हैं। इसी साल झारखंड से कांग्रेस के तीन विधायक इरफान अंसारी, राजेश कछाप और नमन बिक्सल हावड़ा में 50 लाख रुपये से अधिक नकद के साथ पकड़े गए थे। इसके बाद उनके खिलाफ झारखंड सरकार को गिराने की साजिश के तहत एफआईआऱ दर्ज करवाई गई थी। कांग्रेस के ही एक विधायक ने रांची में पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराकर आरोप लगाया कि असम के मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता हिमंत बिस्वा शर्मा झारखंड सरकार गिराने की साजिश में शामिल हैं। आरोप लगे कि इन कांग्रेस विधायकों को भी असम के मुख्यमंत्री से मिलाया जाना था ताकि झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार गिराई जा सके। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इन आरोपों का खंडन किया था।

इस बात को हवा और मिली क्योंकि पिछले कुछ वक्त में झारखंड में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और सीबीआई का झारखंड में सरकार के आला अधिकारियों के यहां पड़े छापे को ‘ऑपरेशन लोटस’ से जोड़कर देखा जाता रहा है। हाल ही में ईडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्र को गिरफ्तार कर उनसे पूछताछ की थी।

हालांकि, फिलहाल हेमंत सरकार विधानसभा में संख्याबल के हिसाब से मजबूत स्थिति में नज़र आती है। 81 सदस्यीय विधानसभा में 30 सीटें जेएमएम की हैं। कांग्रेस 18, आरजेडी, निर्दलीय और भाकपा (माले) की 1-1 सीटों का समर्थन मिलाकर हेमंत की गठबंधन सरकार को ज़रूरी 41 विधायकों से अधिक का समर्थन प्राप्त है। जबकि भाजपा के 26 और उनके गठबंधन आजसू की 2 और 2 निर्दलीय सीटें मिलाकर उनका आंकड़ा विधानसभा में जरूरी बहुमत के आंकड़े से फिलहाल काफ़ी पीछे है।

27 अगस्त की दोपहर को सीएम हेमंत सोरेन और सत्तारूढ़ गठबंधन के विधायकों (42 यूपीए MLAs) को तीन बसों में सवार होकर किसी अनजान जगह के लिए रवाना होते देखा गया।