Headline

मुलायम सिंह यादव: सियासी अखाड़े के वह पहलवान जिन्होंने अपने ‘चर्खा दांव’ से प्रतिद्वंद्वियों को चित किया


By Team Mojo, 11 Oct 2022


उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव पिछले कई दिनों से बीमार चल रहे थे. आज उन्होंने गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में अंतिम सांसें लीं. ये जानकारी अखिलेश यादव ने ट्वीटर के माध्यम से दी. उन्होंने ट्विट करते हुए लिखा कि “मेरे आदरणीय पिता जी और सबके नेता जी नहीं रहे।”

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया लालू यादव ने मुलायम सिंह यादव के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए भावुक हो गए. उन्होंने कहा, “मुलायम सिंह ने देशभर में समाजवादी आंदोलन को काफी आगे बढ़ाया. वो राम मनोहर लोहिया, जननायक कर्पूरी ठाकुर, लोकनायक जयप्रकाश नारायण के विचारों से ओत-प्रोत थे.” लालू ने आगे कहा, “वह तो हमारे तो समधी थे, हमारी बेटी उनके घर में है. हमको एक घटना याद है. जब हम लोग तिलक चढ़ाने गए थे, बिहार से जितने लोग गए थे, सबका नेताजी ने खुद अतिथि सत्कार किया था.” मुलायम सिंह यादव के अंतिम संस्कार में शानिल होने की बात पर लालू यादव ने कहा, “मैंने अखिलेश से बात की है, मैं नेताजी के अंतिम संस्कार में नहीं जा पाऊँगा क्योंकि इलाज के लिए सिंगापुर जा रहा हूँ. उनके अंतिम संस्कार में तेजस्वी जाएंगे.”

जबकि राहुल गांधी ने ट्वीट के ज़रिया शोक व्यक्त किया. उन्होंने लिखा कि “श्री मुलायम सिंह यादव जी का निधन एक बेहद दुःखद समाचार है। वो ज़मीनी राजनीति से जुड़े एक सच्चे योद्धा थे। मैं श्री अखिलेश यादव समेत सभी शोकाकुल परिजनों के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करता हूं।”

नेता जी के नाम से मशहूर मुलायम सिंह यादव उन चुनिंदा समाजवादी नेताओं में से एक हैं जिन्होंने कांग्रेस के ऊरूज़ पर समाजवाद को अलग पहचान दी. यही वजह है कि उनकी मौत के बाद देश भर से पक्ष विपक्ष के लोग दुखों का इज़हार कर रहे हैं. “नेताजी के निधन से भारतीय राजनीति के एक स्वर्णिम युग का अंत होगया है। जाति, धर्म और राजनीति से ऊपर उठकर हर ज़रूरतमंद , दुखी और पीड़ित लोगों की मदद करने में नेता जी जैसा कोई दूसरा नहीं हुआ है.” ये शब्द नेता जी के छोटे भाई प्रोफेसर रामगोपाल यादव के हैं. उन्होंने नेताी की मौत की खबर मोलने के बाद कहा।

सपा विधायक अविनाश कुशवाहा नम आखों से कहते हैं कि “29 वर्ष की आयू में मुझे 2012 विधानसभा चुनाव के लिए सपा ने राबर्ट्सगंज विधानसभा से प्रत्याशी बनाया. जिसका विरोध सपा के विभिन्‍न नेता करने लगे. इस मसले पर बातचीत करते हुए नेता जी ने मुझे स्नेहपूर्वक समझायते हुए कहा कि “बेटा अभी तुम्हारी उम्र बहुत कम है, लेकिन मैं भी तुम्हारी उम्र का था जब पहली बार विधायक चुना गया था. बहुत से नेता तुम्हारा विरोध कर रहे हैं लेकिन तुम्हें अखिलेश ने टिकट दिया है और आने वाला समय नौजवानों का है. इसलिए मैं तुम्हारा टिकट नहीं काटूंगा, क्योंकि आज अगर एक नौजवान का टिकट कटा तो पार्टी के लाखों नौजवानों का मनोबल टूट जायेगा, जो समाजवादी पार्टी को कमज़ोर कर देगा. अत: मैं कभी भी समाजवादी पार्टी को कमज़ोर व बूढ़ा नहीं होने दूंगा, इसलिए अब ये ज़िम्मेदारी अखिलेश की भी है. अत: बेटा जाओ और जीत कर आना और पार्टी को हमेशा जवान बनाए रखना. ताकि पार्टी हमेशा संघर्षशील और गतिशील रहे और गरीब मज़दूर और किसानों की आवाज़ कोई दबा ना सके.”

अविनाश कुशवाहा आगे कहते हैं कि नेता जी के द्वारा कहे गए ये शब्द आज कई दिनों से मेरे कानों में गूंज रहे हैं. उनका आशीर्वाद मिला और मैं 2012 में चुनाव जीत कर विधायक बना. समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह के नज़दीकी वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्रा कहते हैं कि “लोग कहते हैं कि मुलायम सिंह ने संघर्ष किया, लेकिन मैं कहता हूं कि वह भाग्य के बहुत धनी थे, उन्होंने कभी संघर्ष नहीं किया.” योगेश मिश्रा आगे कहते हैं कि “नेता जी बीए करने के बाद जब कुश्ती जीतते हैं तो जसवंतनगर सीट के विधायक नत्थू सिंह ये घोषणा करते हैं कि अब इस सीट से मुलायम सिंह चुनाव लड़ेंगे. और नेता जी 1967 में विधानसभा चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच जाते हैं.”

योगेश मिश्रा के अनुसार विधायक बनने के बाद मुलायम सिंह चौधरी चरण सिंह के नज़दीक आजाते हैं. उस दौरान जब मुलाय सिंह अपना चुनाव हार जाते हैं तब चौधरी चरण सिंह उनको एमएलसी बनाकार नेता प्रतिपक्ष बना देते हैं. अब मामला मुख्यमंत्री की कुर्सी का आता है तब राजनारायण मुलायम सिंह का विरोध करते हैं कि उनके अंदर नेतृत्व क्षमता नगीं हैं. “हालांकि चरण सिंह चाहते थे कि मुलायम सिंह यादव को मुख्यमंत्री बनें लेकिन वह सहकारिता मंत्री बने.” ये कहना है योगेश मिश्रा का. एक दौर आया जब मुलायम सिंह पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ रहे. लेकिन जब 1989 में प्रधानमंत्री चुनने की बात आई तो उन्होंने विश्वनाथ प्रताप सिंह का समर्थन किया. पत्रकार योगेश मिश्रा कहते हैं कि “लेकिन विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मुलायम सिंह के खिलाफ कॉंसपिरेसी की. लेकिन जब बतौर मुख्यमंत्री वीपी सिंह ने एनकाउन्टर करवाया तब मुलायम सिंह लड़े, क्योंकि उन एनकाउन्टर का शिकार ज़्यादातर यादव थे. इसके बाद मुलायम सिंह ‘यादवों’ के नेता के तौर पर उभरे.” बतौर नेता स्थापित होने के बाद मुलायम सिंह ने पार्टी बनाने का मन बनाया. लेकिन आज़म ख़ान को छोड़ कर कोई साथी पार्टी बनाने जे पक्ष में तैयार नहीं थे. उसके बाद उत्तरप्रदेश की राजनीति का एक नया युग आरंभ हुआ.

मुलायम सिंह का राजनीतिक सफ़र

8 बार विधायक, एक बार एमएलसी, 7 बार सांसद व रहे मुलायम सिंह 3 बार उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बने. केंद्र की संयोक्ता मोर्चा की सरकार में रक्षा मंत्री रहे मुलायम सिंह यादव के 55 साल का राजनीतिक करियर को विराम लग गया. मुलायम सिंह ने राम मनोहर लोहिया और राज नारायण से राजनीतिक एबीसीडी सीखी. उन्होंने उत्तर प्रदेश के जसवंतनगर विधानसभा सीट से 1967, 1974, 1985, 1989, 1991 और 1993 में विधायक बने. लेकिन 1996 में मुलायम सिंह यादव सहसवां सीट से विधायक बने, लेकिन 1996 में ही उन्होंने इस सीट से इस्तीफा दे दिया. उसके बाद 1996 में मुलायम सिंह यादव मैनपुरी लोकसभा सीट से पहली बार सांसद बने. वे 1998 में दूसरी बार संभल सांसद बने. 1999 में मुलायम सिंह यादव संभल और कन्नौज से सांसद बने, 2000 में उन्होंने कन्नौज से इस्तीफा दे दिया.

2004 लोकसभा चुनाव में मुलायम सिंह ने मैनपुरी सीट से जीत हासिल की. लेकिन 2004 में ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया. 2009 में मुलायम सिंह यादव पांचवीं बार मैनपुरी से सांसद चुने गए. 2014 में मुलायम सिंह यादव ने आजमगढ़ और मैनपुरी से पर्चा भरा. उन्होंने दोनों जगह से जीत हासिल की, लेकिन बाद में मैनपुरी से इस्तीफा दे दिया. इस तरह वे छठी बार सांसद बने. 2019 में मुलायम सिंह यादव एक बार फिर से मैनपुरी लोकसभा सीट से सांसद चुने गए.

बतौर मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव उत्तरप्रदेश के तीन बार मुखिया बने

मुलायम सिंह पहली बार 1989 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. 1990 में केंद्र में वीपी सिंह सरकार के गिरने के बाद मुलायम सिंह यादव चंद्रशेखर की जनता दल का साथ मिला और कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बने रहे. कांग्रेस ने 1991 मे सरकार से समर्थन वापस ले लिया और मुलायम सरकार गिर गई. 1992 में मुलायम सिंह ने समाजवादी पार्टी की स्थापना की. बतौर मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की दूसरी बार ताजपोशी 1993 में हूई. इससे पहले मुलायम सिंह यादव ने बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन किया. चुनाव नतीजों के बाद मुलायम बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने में कामयाब रहे और स्वयं सीएम बने. 1995 में मायावती की समर्थन वापसी के बाद ये सरकार फिर गिर गई. 2002 में मायावती और बीजेपी ने मुलायम को रोकने के लिए गठबंधन कर लिया था. मायावती सीएम बनीं. लेकिन 25 अगस्त 2003 को बीजेपी ने इस सरकार से समर्थन वापस ले लिया. इसके बाद बीएसपी के बागियों, निर्दलीय और छोटे दलों की मदद से मुलायम सिंह यादव ने सितंबर 2003 में तीसरी बार अपनी सरकार बनाई. 1996 में मैनपुरी लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे मुलायम सिंह यादव ने केंद्र की राजनीति में कदम रखा. दरअसल नॉन कांग्रेस पार्टियों के समर्थन से केंद्र में संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी. इस सरकार को समाजवादी पार्टी ने समर्थन दिया, इस तरह मुलायम सिंह देश के दसवें रक्षा मंत्री बने. एचडी देवगौड़ा की ये सरकार 1998 में गिर गई.

प्रधानमंत्री न बन सके मुलायम सिंह

1996 में लोकसभा चुनाव के बाद 161 सीटें आने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. लेकिन बहुमत न होने के कारण 13 दिन बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने इस्तीफा दे दिया. इसके बाद सवाल खड़ा हुआ कि अब नई सरकार कौन बनाएगा. कांग्रेस के पास 141 सीटें थीं. लेकिन कांग्रेस गठबंधन सरकार बनाने के पक्ष में नहीं थी. इसके बाद गैर कांग्रेसी पार्टियों ने गठबंधन सरकार बनाने की पहल शुरू हुई. गठबंधन सरकार के अस्तित्व में आने के लिए प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे पहले वीपी सिंह और ज्योति बसु का नाम सामने आया. लेकिन सहमति नहीं बन पाई. अब दो नाम लालू यादव और मुलायम सिंह यादव पर फैसला लेना था लेकिन उस समय लालू चारा घोटाले में फंस चुके थे. इसलिए लालू के नाम पर सहमति नहीं बन पाई. अब फैसला मुलायम सिंह के नाम पर लेना था. लेकिन ऐन मौके पर लालू ने सियासी चाल चली और उनकी उम्मीदवारी का विरोध कर दिया. इस कारण मुलायम सिंह 1996-1998 तक मुलायम सिंह भारत की संयुक्त मोर्चा सरकार में रक्षा मंत्री ही बनेरह गए.

योगेश मिश्रा बताते हैं कि लालू यादव, विश्वनाथ प्रताप सिंह, शरद यादव और चंद्बाबू नायडू ऐसे चार नाम हैं जो नहीं चाहते थे कि मुलायम सिंह प्रधानमंत्री बनें. जबकि हरकिशन सिंह सुर्जीत चाहते थे कि मुलायम सिंह प्रधानमंत्री बनें. उन्होंने मीटिंग में मुलायम सिंह का नाम सभी के सामने रखा, लेकिन लालू यादव ने कहा कि ये सरकार बहुत कम दिन चल पाएगी इस लिए मुलायम सिंह जैसे बड़े नेता को प्रधानमंत्री नहीं बनाना चाहिए. उसके बाद लालू यादव कहा कि इस छोटे काल खण्ड में कोई भी घोड़ा दौड़ सकता है, उसके बाद लालू जी देवगौड़ा को मंच पर ले गए और प्रधानमंत्री घोषित कर दिया. योगेश मिश्रा ने आगे कहा कि “मुलायम सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का दूसरा मौका आया जब 1997 में देवगौड़ा की सरकार गिर गई, तब दस दिनों तक संयुक्त मिर्चा में प्रधानमंत्री की तलाश हूई, लेकिन लालू यादव, विश्वनाथ प्रताप सिंह, शरद यादव और चंद्बाबू नायडू नहीं चाहते थे कि मुलायम सिंह को प्रधानमंत्री बनाया जाए. इस लिए इंद्र कुमार गुजराल को प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला.

मुख्यमंत्री बनते ही मुलायम सिंह का भाजपा से सामना

पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद उस ज़माने में मुलाय सिंह जहां भाजपा का सामना कर रहे थे वहीं मुस्लिम समाज भी उनके नज़दीक आ रहा था. इसकी वजह उनके द्वारा कहा गया वाक्य “बाबरी मस्जिद पर एक परिंदा भी पर नहीं मार सकेगा,” है. ये मुलायम सिंह के ही कार्यकाल की बात है जब दो नवंबर, 1990 को बाबरी मस्जिद की तरफ़ कारसेवकों के बढ़ते कदमिं को विराम लगाने के लिए उन पर पहले लाठीचार्ज हूइो, फिर गोलियां चलीं. जिसमें एक दर्जन से अधिक कार सेवक मारे गए. इस घटना के बाद भाजपाइयों ने मुलायम सिंह यादव को ‘मौलाना मुलायम’ कह कर पुकारा.

2012 का विधानसभा जीतने के बाद मुलायम सिंह ने अपने बेटे अखिलेश यादव को उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया. लेकिन अखिलेश यादव 2017 विधानसभा चुनाव के समय समाजवादी पार्टी पर पूरा नियंत्रण हासिल करने की लालसा के बीच भाजपा ने समाजवादी पार्टी को ज़बरदस्त पटखनी दी. दरअसल चुनाव से कुछ दिनों पहले अखिलेश ने पिता को पार्टी के अध्यक्ष पद से हटा दिया था. मुलायम सिंह ने चुनाव प्रचार में भाग नहीं लिया. राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि अखिलेश ने मुलायम सिंह की इच्छा के ख़िलाफ़ 2019 लोकसभा चुनाव मायावती के साथ मिल कर लड़ा. इस गठबंधन से समाजवादी पार्टी को कोई खास लाभ नहीं हुआ लेकिन शून्य होती बसपा ने कुछ लोकसभा सीटें जीत लीं.

उत्तरप्रदेश सरकार में मंत्री राकेश सचान का मानना है कि मुलायम सिंह ने राजनीति को रिश्तों पर और रिश्तों को राजनीति पर हावी नहीं होने दिया. यही बात उनको बड़ा नेता बनाती है. “मुझे याद है कि दूसरे दलों के नेता जब भी मदद मांगने के लिए आते तो नेता जी उनको मदद करते हुए कहते कि राजनीति में वैचारिक लड़ाई होती है उसे व्यक्तिगत नहीं बनाना चाहिए,” मंत्री राकेश सचान ने कहा. 2019 लोकसभा चुनाव में सपा के पूर्व सांसद राकेश सचान फतेहपुर लोकसभा सीट से दावेदार थे. लेकिन सीट बसपा के खाते में चली गई, इस कारण राकेश सचान ने मुलायम सिंह के नज़दीकी होने के बावजूद 24 साल बाद सपा को अलविदा कह दिया.

समाजवादी पार्टी के उत्तरप्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल ने कहा कि राजनीति में कदम रखने के बाद नेता जी ने मुझ से कहा कि “जनता से जो कहो वह करो, कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं आना चाहिए,” नेता जी का ये वाक्य मुझे प्रेरित करता है, यही कारण है कि मैंने अपने 45 वर्ष राजनीति में दिए. लेकिन आज जननेता ने हम सभी को अलविदा कह दिया.