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पंजाब: ‘किसान हितैषी’ सरकार करवा रही किसानों पर लाठीचार्ज, नहीं कर रही मांगें पूरी

एक साल से भी कम समय में ‘आप सरकार’ और किसानों के बीच कई बार टकराव हो चुके हैं। ताजा मामला मंसूरवाल में मालब्रोस फैक्ट्री का है। पुलिसिया विरोध के बावजूद किसान संगठन जीरा मंसूरवाल पहुंच रहे हैं।

आज से करीब़ डेढ़ साल पहले देश ऐतिहासिक किसान आंदोलन का साक्षी बना था। तीन कृषि कानूनों के खिलाफ़ हुआ किसानों का वह प्रर्दशन एक ऐसा आंदोलन बनकर उभरा, जिसने केंद्र सरकार को अपने फैसले पर विचार करने को मजबूर कर दिया। उस दौरान, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को छोड़कर शायद ही देश का कोई ऐसा राजनीतिक संगठन होगा जिसका समर्थन किसानों के आंदोलन को न मिला हो।

चूंकि आंदोलन की नींव पंजाब से पड़ी थी और विधानसभा चुनाव नज़दीक थे, लिहाजा आम आदमी पार्टी (आप) जो पंजाब में अपनी पैठ बनाना चाहती थी, उसके लिए यह एक अवसर बनकर भी आया। तब संगरूर से आप सांसद भगवंत मान (मौजूदा मुख्यमंत्री) लोकसभा में किसानों के हित में आवाज़ बुलंद किया करते थे। ऐसे में किसानों के दिल्ली कूच के दरमियान दिल्ली की ‘आप’ सरकार ने आंदोलनरत किसानों का स्वागत किया था। उन्हें ज़रूरी संसाधन उपलब्ध करवाने में सक्रिय भूमिका निभाई थी।

किसान आंदोलन ख़त्म होने के बाद जब पंजाब में विधानसभा चुनाव हुए तो ‘आप’ ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की। आप की इस जीत को सुनिश्चित करने में किसानों की अहम भूमिका रही। किसानों ने न सिर्फ ‘आप’ के पक्ष में प्रचार किया, बल्कि बूथ भी संभाले। महिला किसानों, नौजवानों ने आप के लिए पोलिंग एजेंट की भूमिका तक निभाई। जब आप की सरकार बनी तो किसानों के बीच भरोसा पैदा हुआ कि यह ‘उनकी अपनी’ सरकार है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भी आश्वस्त किया कि उनकी कलम किसानों, बेरोजगारों और वंचितों के काम आएगी। लेकिन अब जब ‘आप’ सरकार के एक साल होने जा रहे हैं, तो किसान यह कहते मिल रहे हैं कि सरकार उनकी मांगों को पुलिसिया हथकंडों से दबाना चाहती है।

किसानों का हुआ मोहभंग

किसानों के रोष से चिंतित ‘आप सरकार’ ने बीते दिनों किसानों के समर्थन में लिए गए फैसलों की फेहरिस्त जारी की। पंजाब के कृषि मंत्री कुलदीप सिंह धालीवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा, “आम आदमी पार्टी की सरकार मूंग दाल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) लेकर आई। सरकार ने साल 2020-2021 में किसान आंदोलन के दौरान मरने वाले किसानों के परिजनों को नौकरी दी और पंजाब में पराली जलाए जाने की समस्या को बहुत हद तक नियंत्रित किया।”

धालीवाल का यह बयान तब आया है जब किसान अपनी मांगों को लेकर फ़िरोज़पुर की ज़ीरा तहसील के मंसूरवाल गांव स्थित मालब्रोस इंटरनेशनल लिमिटेड के पास प्रर्दशन कर रहे हैं, ऐसे में इसे उन्हें शांत करने की कोशिश माना जा रहा है। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि मालब्रोस कारखाने को बंद किया जाए। उनका कहना है कि यह कारखाना मिट्टी, हवा और भूजल को प्रदूषित कर रहा है।

नियम के अनुसार, शराब की फैक्ट्री लगाने के पहले ग्रामीणों की स्वीकृति ज़रूरी है। जबकि किसानों का कहना है कि फैक्ट्री बनाते समय उनसे कोई राय नहीं ली गई, बल्कि केवल कागजी प्रक्रियाओं की खानापूर्ति हुई।

ग्रामीण मालब्रोस फैक्ट्री गेट पर पिछले जुलाई से ही धरना दे रहे थे। प्रदर्शनकारियों को पुलिस द्वारा प्रदर्शन स्थल से जबरदस्ती हटाने का प्रयास भी हुआ। किसानों पर मामले भी दर्ज हुए और वहीं कुछ को हिरासत में लिया गया था। सरकार की इन कार्रवाइयों से किसानों में काफ़ी रोष था।

उधर, फैक्ट्री प्रबंधन प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट चला गया। कोर्ट ने कहा कि पंजाब सरकार फैक्ट्री के नुकसान की भरपाई करे और प्रदर्शनकारियों को फैक्ट्री के गेट से हटाकर सारे गेट खुलवाए। इसके बाद पुलिस ने प्रदर्शनकारी किसानों को हटाने के लिए बल प्रयोग किया। इसके बाद किसानों की सरकार के प्रति नाराज़गी और बढ़ गई।

पंजाब सरकार ने किसानों पर लाठीचार्ज को यह कहते हुए सही ठहराया कि पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का आदेश था कि फैक्ट्री के बाहर से प्रदर्शनकारियों को हटाया जाए, “सरकार ने कोर्ट के आदेश का पालन किया है।”

हालांकि, प्रदर्शनकारी इस बात पर अड़ गए कि वे तब तक फैक्ट्री के बाहर से नहीं हिलेंगे, जब तक कि सरकार यह फैक्ट्री बंद नहीं कर देती।

प्रदर्शनकारी किसानों का आरोप है कि मुख्यमंत्री भगवंत मान फैक्ट्री मालिक और शराब कारोबारी दीप मल्होत्रा (शिरोमणि अकाली दल के पूर्व विधायक) के करीब़ी हैं। बता दें कि दिल्ली आबकारी नीति घोटाले में मल्होत्रा के पंजाब स्थित दो घरों पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की छापेमारी भी हुई है।

पंजाबी गायक जगदीप रंधावा (जो कभी भगवंत मान के समर्थक हुआ करते थे) ने कहा कि वे सरकार के रवैये से हैरान हैं। वे कहते हैं, “आम आदमी पार्टी के नेता मुद्दों पर केवल तभी तक बात कर रहे थे, जब तक वे सत्ता में नहीं थे। सत्ता में आने के बाद से वे वही कर रहे हैं जो बाकी पार्टियां करती आ रही हैं।”

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री बनने से पहले सांसद भगवंत मान ने यह मुद्दा ख़ुद ही बड़ी ज़ोर-शोर से उठाया था। उन्होंने सार्वजनिक रूप से बयान दिया था कि पंजाब में शराब की फैक्ट्रियां पानी दूषित कर रही हैं और प्रदूषण फैला रही हैं।

भारतीय किसान यूनियन (क्रांतिकारी) के अध्यक्ष सुरजीत सिंह फूल ने सवाल खड़ा किया कि “सरकार को शराब फैक्ट्री को मुआवजा देने की इतनी जल्दबाजी क्यों है? किसानों को तो अपने फसलों के नुकसान का मुआवज़ा पाने के लिए महीनों तक विरोध करना पड़ता है। ऐसा लगता है कि वे हमें प्रदर्शन स्थल से जबरन हटाने की कोशिश और शराब कारोबारी को मुआवजा दे कर खुश हैं।”

जीरा सांझा मोर्चा के समर्थन में किसान प्रर्दशन स्थल पर कई गीत गा रहे हैं। उनमें से एक गीत जो उनकी हताशा दर्शाता है;
“जीरा सांझा मोर्चा, सबकी सांझी जंग
सब किसान मजदूर को लड़ना मिलकर संग।
जैसी मोदी की नीयत, वही मान की नीति
दिल्ली जीता जिस तरह, वैसी होगी जीत।”

बूटा सिंह के शव के साथ जीरा सांझा मोर्चा के किसान। फ़ोटो क्रेडिट: मोहित गहलोत

फैक्ट्री के पास रहने वालों में किडनी खराब होने की शिकायतें

इलाके में पिछले दो सप्ताह के अंदर दो नौजवानों की किडनी की समस्या से मौत हो चुकी है। रतौल रूही के रहने वाले 50 वर्षीय बूटा सिंह का घर फैक्ट्री से दो किलोमीटर दूर था। परिवार का कहना है कि बूटा ने वर्षों पहले फैक्ट्री में कुछ महीने काम किया था। पिछले एक साल से उन्हें किडनी की समस्या थी। बूटा सिंह के ग्यारवहीं कक्षा में पढ़ने वाले बेटे नवदीप सिंह ने कहा, “डॉक्टर की रिपोर्ट के मुताबिक पापा की किडनी में दिक्कत थी और यह समस्या दूषित पानी की वजह से हुई थी।”

जीरा सांझा मोर्चा के संयोजक रोमन बराड़ के अनुसार, “बूटा सिंह के पहले मंसूरवाल के 38 वर्षीय राजवीर सिंह की भी किडनी की समस्या से मौत हो चुकी है। बूटा सिंह के घर के बगल में रहने वाली 50 वर्षीय महिला को भी डॉक्टरों ने किडनी की समस्या बताई है। यह सब दूषित पानी की वजह से हो रहा है।”

खिंच रही हैं लकीरें

किसानों को विपक्षी दलों का साथ मिल रहा है। पंजाब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग ने भगवंत मान सरकार को शराब फैक्ट्री के बाहर प्रदर्शन कर रहे किसानों को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी है। उन्होंने कहा है कि प्रदर्शनकारी किसानों पर किसी भी तरीके का बल प्रयोग सहन नहीं किया जाएगा। ‘आप’ सरकार के लिए यह बड़ी चुनौती है, क्योंकि वर्तमान में कांग्रेस की बहुचर्चित ‘भारत जोड़ो यात्रा’ पंजाब से गुजर रही है।

वहीं, पंजाब की खेती-किसानी पर गहन अध्ययन कर रहे और संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य रहे हरिंदर हैप्पी कहते हैं, “एक इकलौती चीज़ जो पंजाब की खेती-किसानी में बदली है वह है कृषि कानूनों के ख़िलाफ़ किसानों के प्रदर्शन की जगह। कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार के दौरान किसान पटियाला में विरोध-प्रदर्शन किया करते थे, उनके आवास के पास। अब यही प्रदर्शन संगरूर में होते हैं, भगवंत मान के गृह नगर में। यह बताता है कि पंजाब में खेती-किसानी की समस्या जस की तस बनी हुई है।”

हैप्पी आगे कहते हैं, “पंजाब की मौजूदा आप सरकार मूंग की फसल की एमएसपी देने में नाकामयाब रही। गन्ना का बकाया अब तक नहीं चुकाया गया और कपास और गर्मी के कारण गेंहू की फसल के नुकसान की भरपाई नहीं की गई।”

हालाँकि, हैप्पी मानते हैं कि वर्तमान सरकार का जाने-माने अर्थशास्त्री डॉ. सुखपाल सिंह की बतौर पंजाब स्टेट फार्मर्स और फार्म लेबर कमिशन के सचिव तौर पर नियुक्ति करना सराहनीय कदम है। आगे वे कहते हैं, “लेकिन यह जानना भी दिलचस्प होगा कि क्या आप सरकार डॉ. सुखपाल की सिफारिशों को मंजूर करेगी?”

पंजाब सरकार और किसान में पहले भी कई टकराव

मालूम हो कि यह पहली बार नहीं है जब पंजाब की ‘आप’ सरकार और किसानों का टकराव हो रहा है। पहला टकराव 29 मार्च 2022 को ही हो गया था जब मुक्तसर के लंबी में विरोध कर रहे किसानों पर लाठीचार्ज में सात किसान घायल हो गए। तब भारतीय किसान यूनियन (राज्य का सबसे बड़ा किसान संगठन) क्षतिग्रस्त कपास की फसलों के मुआवजे़ की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहा था।

फिर, पिछले साल 9 अक्टूबर को भारतीय किसान यूनियन (उगराहां) संगरूर में मान के घर धरने पर तब तक बैठा रहा जब तक कि किसानों को लिखित आश्वासन नहीं दिया गया कि उनकी मुआवजे़ की मांग पूरी की जाएगी। ठीक उसके अगले महीने नवंबर में सांझा मजदूर मोर्चा (खेतिहर मजदूरों संघों का एक समूह) के ऊपर लाठीचार्ज हुआ। सैकड़ों खेतीहर मजदूर अपनी दिहाड़ी में बढ़ोतरी की मांग को लेकर मुख्यमंत्री के संगरूर स्थित निवास के बाहर प्रदर्शन कर रहे थे।

मुख्यमंत्री मान ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इन प्रदर्शनों के लिए किसान संगठनों को दोषी ठहराया। उन्होंने यहां तक कह दिया कि किसान यूनियन पैसे लेकर उनकी सरकार के खिलाफ विरोध कर रहे हैं। तब मुख्यमंत्री के बयान से नाराज होकर संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) के मुखिया जगजीत सिंह दल्लेवाल किसानों के समर्थन में उपवास पर बैठे थे।

इसके पहले मई में चंडीगढ़-मोहाली सीमा के निकट किसानों ने मान को गेहूं की उपज पर बोनस की मांग को लेकर घेरा था। मुख्यमंत्री ने किसानों से मिलने का वादा किया था, लेकिन अंतिम वक्त पर बैठक रद्द कर दी गई। मान ने कहा कि मुर्दाबाद के नारे लगाना विरोध का ठीक तरीका नहीं है। इस तरह के प्रदर्शन अवांछनीय हैं।

फिलहाल, पुलिसिया विरोध के बावजूद किसान संगठन जीरा मंसूरवाल पहुंच रहे हैं। जो किसान कृषि कानून के खिलाफ़ देशव्यापी आंदोलन के वक्त सक्रिय भूमिका में थे, वे अब यहां भी नजर आ रहे हैं। हरियाणा से भी किसान जीरा मोर्चा की ओर कूच कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि पंजाब में एक नया किसान मोर्चा जन्म ले रहा है।